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Showing posts from 2026

लघुकथा : आशा और निराशा

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AI Image -नायला अदा इस शहर की सुबह आज कुछ अलग ही थी। हर गलियों में हलचल थी, दीवारों पर लगे पोस्टर हवा में फड़फड़ा रहे थे और मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही थीं। लेकिन सबसे ज्यादा चमक एक लड़की की आँखों में थी, क्योंकि आज वह पहली बार वोट देने जा रही थी। उसने कई दिनों तक हर उम्मीदवार और पार्टी के बारे में पढ़ा था। वह ऐसे लोगों को चुनना चाहती थी जो धर्म, जाति और नफरत की बातें न करें, बल्कि लोगों को जोड़ें। उसके मन में एक ही सपना था- ऐसा समाज जहाँ लड़कियाँ बिना डर के पढ़ सकें, आगे बढ़ सकें और अपने फैसले खुद ले सकें। सुबह जल्दी उठकर उसने बड़े उत्साह से अपनी उंगली पर स्याही लगवाई और वोट डाल दिया। मतदान केंद्र से बाहर निकलते समय उसके चेहरे पर गर्व था। उसे लगा, जैसे उसने देश के भविष्य में अपना छोटा-सा योगदान दे दिया हो। पूरा दिन वह टीवी और मोबाइल पर खबरें देखती रही। एग्ज़िट पोल देखकर उसके मन में उम्मीद और बढ़ गई। उसे पूरा विश्वास था कि वही पार्टी जीतेगी, जिसे उसने चुना था। लेकिन नतीजे आने शुरू हुए तो उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। जिन लोगों और विचारों के खिलाफ वह थी, वही ...

एक मौका : लघुकथा

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  AI Image ...जब इंसान अपने ही जुड़े हुए लोगों को माफ नहीं कर पाता, तो रिश्ता सड़ने लगता है और उसमें से बदबू आने लगती है। चाहे जीवन कितना भी आधुनिक क्यों न हो, लेकिन उस घर में दोनों अजनबियों की तरह रहने लगे थे। (इसी कहानी से) शमीमा हुसैन नफीसा और सलमान की एक खूबसूरत जोड़ी थी। नफीसा आधुनिक विचारों वाली महिला थी। शादी के दिन से ही वह घर को अपने तरीके से चलाती आ रही थी। नफीसा अपने कपड़ों से लेकर बर्तनों तक सब कुछ आधुनिक रखना पसंद करती थी। इसी बात को लेकर सास और बहू में अक्सर तकरार हो जाती थी। जिस घर को नफीसा कुछ सालों से संभाल रही थी, उस घर को उसकी सास कई दशकों से चला रही थीं। सास का कहना था कि नफीसा का दिमाग खराब हो गया है, वह फिजूल खर्ची करती है। लेकिन नफीसा का मानना था कि हमें नए समय के साथ जीना चाहिए और पुरानी चीजों को बदल देना चाहिए। नफीसा के सारे कपड़े वेस्टर्न थे, इस बात से भी सास को खीज होती थी। नफीसा पिछले कुछ सालों से अपनी एक दुकान भी चला रही थी। इस बात पर भी घर में एतराज़ होता था। सास कहती थीं कि जब अल्लाह का दिया सब कुछ है तो काम करने की क्या ज़रूरत है। लेकिन नफीसा का कहना...

चुप्पी की आवाज़ : लघुकथा

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AI Image आज सारा थोड़ी देर से उठी थी, लेकिन इसके पीछे भी एक वजह थी। कल अम्मी बाज़ार से अंगूर लाई थीं। भाई को ज़्यादा अंगूर मिले और सारा को बहुत कम। जब सारा ने हिम्मत करके कहा,“अम्मी, मुझे भी थोड़ा और दे दीजिए,”तो उसे जवाब में डांट और मार मिली। वहीं भाई को बिना कुछ कहे तीन रुपये दे दिए गए। शमीमा हुसैन सारा चुपचाप खड़ी थी।अम्मी की कठोर आवाज़ उसके कानों में गूंज रही थी। “सारा, तुम पूरे दिन बस खाती रहती हो। तुम्हें कोई काम नहीं सूझता। अगर यही आदत रही तो रोज़ मार खानी पड़ेगी।” सारा कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि एक शब्द भी बोलने से अम्मी का गुस्सा और बढ़ जाएगा। वह अभी सिर्फ़ नौ साल की थी, लेकिन इतनी छोटी उम्र में ही उसने चुप रहना सीख लिया था। सारा का भाई उससे दो साल बड़ा था। घर में उसके लिए कोई नियम नहीं थे। वह दिन भर सोए, खेले या खाए—किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। भले ही वह अभी बच्चा था, लेकिन उसे घर में बड़े पुरुष जैसा सम्मान मिलता था। उसकी हर गलती माफ़ कर दी जाती थी। आज सारा थोड़ी देर से उठी थी, लेकिन इसके पीछे भी एक वजह थी। कल अम्मी बाज़ार से अंगूर लाई थीं। भाई को ज़्यादा अंगूर मिले और सा...

कोरोना काल

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AI Image कोरोना ने जो करना था, वह किया। पति का काम छूट गया। पहले का जमा-पूंजी लॉकडाउन के पहले ही महीने में खत्म हो गया। ऐसी मुसीबत पहले कभी नहीं आई थी। शमीमा हुसैन एक दिन में हुमा भाभी पचास आदमियों का खाना पका लेती है। कोरोना के समय जिंदगी ने उसे जीवन का एक नया पाठ पढ़ाया। वह पाठ नया भी था और बहुत तकलीफदेह भी था। हुमा ने भी वह सबक सीखा। कई दिन ऐसे भी आए जब घर में मुट्ठी भर भी चावल नहीं था। हुमा की एक आदत है—वह बड़ी से बड़ी मुसीबत भी किसी को नहीं बताती। अपनी माँ को भी अपना दुःख नहीं बताती। वह बस एक ही बात याद रखती है—अल्लाह मेरे साथ है। कोरोना ने जो करना था, वह किया। पति का काम छूट गया। पहले का जमा-पूंजी लॉकडाउन के पहले ही महीने में खत्म हो गया। ऐसी मुसीबत पहले कभी नहीं आई थी। आदमी से आदमी बहुत डरने लगा था। दिन भर में हाथ दस बार धोना पड़ता था। तब खाना और पैसे की असली कीमत पता चली। दो दिन से घर में कुछ भी पका नहीं था। बच्चों का भूख से बुरा हाल था। बच्चे टीनएज के थे। हुमा से अपने बच्चों को भूख से बेहाल देखना सहा नहीं जा रहा था। तीसरे दिन वह पड़ोसी के घर चावल माँगने गई। चावल में नमक डालकर...

मास्टर साहब : लघुकथा

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  AI Image शमीमा हुसैन सुबह के चार बजे थे। मास्टर साहब के घर में खूब हल्ला मच रहा था। उनके घर में आम तौर पर छह बजे चहल-पहल होती है, लेकिन  आज भोर के चार बजे ही शोर होने लगा। मास्टर साहब की बीबी यूरोप घूमकर आई है,  मास्टर साहब का बेटा यूरोप में नौकरी करता है और अपने परिवार को वहीं साथ रखता है। उसने माँ-बाप को भी यूरोप घुमाया। महल्ले में यह रिवाज है कि जिसका पति जो काम करता है, उसी नाम से उसकी बीबी भी जानी जाती है। मास्टरनी ने चार बकरियाँ पाल रखी हैं। सुबह से रात तक वह बकरियों में ही लगी रहती है। बकरी का पालन-पोषण कैसे करना है, यह पूरे महल्ले को समझाती रहती है। वह भले ही किताबी मास्टरनी न हो, लेकिन बकरी पालने की मास्टरी उसे खूब आती है। एक बेटा और बहू उसके साथ रहते हैं। बेचारी बहू पूरे घर को संभालती है। मास्टरनी दिन-रात बकरियों की सेवा करती है, पर घर में एक गिलास तक नहीं उठाती। घर में वह असली सास बनी रहती है, लेकिन बकरियों के लिए अम्मा बनी रहती है। उसके लिए बकरी पालना मेहनत नहीं, बल्कि बकरियों के साथ मस्ती करना है। घर में सब कुछ किया-धरा रहता है, इसलिए उसके पास समय भी खूब रह...

ईदी : लघुकथा

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AI Image -शमीमा हुसैन आज ईद का दिन है। चारों तरफ खुशियों का मंजर है, लेकिन सफूर और रफ़ीक दोनों भाई आज दूर-दूर हैं।  एक महीने के रोज़ों के बाद यह दिन आया है। हर कोई खुश है। एक महीने की मेहनत और संयम का फल है आज का दिन। रोज़ा, नमाज़, सहरी, इफ्तारी और तरावीह जैसी इबादतों के बाद आज ईद आई है। हर कोई खुश है, क्योंकि ऐसी खुशी पूरे साल में शायद ही कभी देखने को मिलती है। ईद मनाने की इतनी उत्सुकता होती है कि रमजान के दौरान रोज़ बाज़ार सजते हैं। लोग नए कपड़े और  खरीदने के लिए बाज़ार जाते हैं। महीने भर रोज़ा और इबादत करके लोग नेकी का खज़ाना जमा करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह नेकी और बरकत का महीना होता है। कम खाने और ज्यादा इबादत करने से दिल भी नर्म हो जाता है। सफूर और रफ़ीक दोनों भाई का एक ही आंगन था। दोनों भाइयों के बच्चे साथ खेलते, साथ खाते और कभी-कभी साथ झगड़ भी लेते थे। इसी तरह दिन बीत रहे थे और बच्चे बड़े हो रहे थे। लेकिन एक दिन बच्चों के झगड़े ने उस एक आंगन को दो आंगन बना दिया। सहीद और जमाल के बीच जोरदार लड़ाई हो गई। जमाल का माथा फूट गया और खून बहने लगा। जमाल सफूर क...

ताना : लघुकथा

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    AI IMAGE  -शमीमा हुसैन  कमर और युसुफ़ बहुत अच्छे दोस्त थे। कमर की बर्तन की दुकान थी और दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। युसुफ़ एक कंपनी में काम करता था। उसकी शादी हो चुकी थी, लेकिन अभी तक उसके कोई बच्चे नहीं थे। कमर के दो बच्चे थे—एक तीन साल की और दूसरा सात महीने का। दोनों दोस्त रोज़ एक बार ज़रूर मिलते थे। युसुफ़ सबसे खुश होकर बात करता था, वह बहुत मिलनसार इंसान था। युसुफ़ को बच्चों से बहुत प्यार था। वह रोज़ कमर के घर आता और घंटों बच्चों के साथ खेलता रहता। बच्चों के लिए वह कुछ न कुछ खाने की चीज़ ज़रूर लाता। तीनों मिलकर खुश होकर खाते और खेलते। दोस्ती के साथ-साथ दोनों बच्चे भी बड़े हो रहे थे। जब युसुफ़ जाने लगता, तो बच्चे रोने लगते। तीन साल की रूमी अपनी मासूम आवाज़ में कहती, “चाचा, अभी और रुको,” और गोद में बैठ जाती। यह रोज़ का खेल था। लेकिन कमर की बीवी को यह अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उसने कह दिया, “आप मेरे बच्चे को खराब कर रहे हैं।” यह ताना युसुफ़ के दिल में कील की तरह चुभ गया। वह कुछ पल वहीं खड़ा रहा, जैसे ज़मीन ने उसके पैर पकड़ लिए हों। उसने कमर की बीवी की तरफ़ द...

गुलाबी ठंड वाली सुबह : लघुकथा

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  AI  Image  शमीमा  हुसैन  गुलाबी ठंड की वह सुबह कुछ अलग ही थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा ऐसे लग रही थी, जैसे पूरे घर में फुहारों की मिठास घोल रही हो। किरन के पास कई काम थे। बेटे के पैंट की चेन टूटी थी, शर्ट का बटन निकला था। इसके अलावा और कई काम हाथ में था, फिर भी किरन सुबह छह बजे से चाय–नाश्ता बनाते हुए ऐसे फुदक रही थी जैसे मौसम ने उसमें नई जान डाल दी हो। आज हर काम जैसे खुद-ब-खुद हो रहे थे। एक हाथ से झाड़ू लगाती तो मन में लगता—चलो, एक कपड़ा भी निचोड़ दूँ। ठंड का मौसम ही ऐसा होता है—उत्साह से भरा हुआ। आठ बजते ही दिल में एक आवाज उठी— “आज गार्डन ज़रूर जाना है।” सप्ताह में दो बार जाना तय था, पर इस हफ्ते एक भी दिन न जा पाई थी। जल्दी-जल्दी सब काम निपटाकर,  और ठंडी हवा के साथ कदम बढ़ा दिए। गार्डन पहुँची तो हवा का पहला झोंका जैसे पूरे तन-मन पर फूल बिखेर गया। किरन ने गहरी साँस ली—मन हल्का हो गया। तभी दूर बेंच पर अफ़सा दिखाई दी। किरन की चाल तेज हो गई। “अस्सलाम अलैकुम!” “वअलैकुम सलाम!” दोनों सहेलियाँ पास-पास बैठ गईं। कुछ ही पल में बातों का सिलसिला खुल गया—घर की बातें, दुन...

इमानदार :लघुकथा

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AI  Image -शमीमा हुसैन  रोमन  एक कारपेंटर हैं। उसके अब्बा भी यही काम करते थे। अब्बा ने बेटे को कभी प्यार से, कभी सख़्ती से यह हुनर सिखाया था। उस कच्ची उम्र में अब्बा की बातें उसे बकवास लगती थीं, लेकिन आज उसे महसूस होता है कि अब्बा की हर बात अनमोल थी। इसी हुनर के बल पर रोमन आज अपना परिवार पाल रहा है। रोमन के तीन लड़कियाँ और एक लड़का है। उसकी कमाई से घर तो चल जाता है, लेकिन पैसा बचता नहीं है। रोमन के पास कोई सेविंग नहीं है। रोमन एक बहुत अच्छा कारपेंटर है। उसकी कला देखकर मन खुश हो जाता है। उसकी कारीगरी की चर्चा पूरे शहर में होती है। वह अपने काम में निपुण है। अब्बा ने उसे एक बात सिखाई थी—“बेटा, ईमानदार रहना, इसी में चैन-सुकून है।” आजकल के ज़माने में सच्चाई को बेकार की चीज़ समझा जाता है, लेकिन रोमन इस नसीहत को गले में पट्टी की तरह बाँधे हुए है। पिछले साल की बात है। शहर के एक सेठ ने उसे काम पर बुलाया और कहा कि हमारे घर का सारा फर्नीचर बना दो, जितना खर्च होगा बता देना। रोमन ने हिसाब लगाया और कहा—तीन लाख रुपये खर्च होंगे। सेठ ने उसे   काम दे दिया और रोमन काम करने लगा। ए...

दाई : लघुकथा

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AI Image    शमीमा हुसैन     अम्मा,  भादो आ गया है। “अम्मा, अम्मा, जुमेरात चला गया।” पुरानी टोला में सब इस जुमेरात को नियाज़ दिलाएँगे। “अम्मा, आप कब नियाज़ देंगी?” अम्मा खटिया पर लेटी है। कभी-कभी आँख खोलती है, फिर बंद कर लेती है। बच्चों की बातों में ज़रा भी रुचि नहीं है। उनके ज़ेहन में एक ही बात चल रही है—डाकिया कब आएगा। पिछले महीने तो सात तारीख को आया था। सुधि दुकानवाले का भी बहुत पैसा हो गया है। इस बार डाकबाबू बहुत देर लगा दिया है। अम्मा खटिया से उठकर आँगन में बर्तन माँजने लगती है। अनीस बाहर खेल रहा था। बच्चे फिर बेरा-बीबी, नियाज़ की बात करने लगे—कहाँ से फूल लाना है, कहाँ से थम्ब। कितना सुंदर, कितना बड़ा बेरा बनाना है—अनीस यह सब सुन रहा था। उसका रोने-रोने को हो गया। दौड़ता हुआ घर आया, अम्मा के पास आकर रोने लगा। अम्मा की चुप्पी टूटी। अनीस ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था— “अम्मा, हम सब बेरा-बीबी कब बनाएँगे?” अम्मा गुस्से में लाल होकर बोली— “पैसा आने दे, तब नियाज़ दिलाएँगे।” अनीस को बेरा-बीबी का पर्व बहुत अच्छा लगता था। इस पर्व में हल्ला-चिल्ला नहीं होता, शांति से पर्...

जनवरी : लघुकथा

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AI Image  -शमीमा हुसैन  रेखा बहुत मेहनती और हिम्मत वाली महिला है। वह लोगों के घरों में काम करती है। सब उसे घर का काम करने वाली बाई कहते हैं। वह चार घरों में काम करती है। रेखा सुबह से शाम तक दूसरों के घरों का काम करती रहती है। घर लौटकर वह अपने घर का काम भी करती है। देर रात तक उसे अपने घर का काम करना पड़ता है। पति से उसे कोई मदद नहीं मिलती थी। इस बात से वह अक्सर चिढ़ जाती थी। पति के इस रवैये से रेखा को बहुत कष्ट होता था। पति कभी काम पर जाता था, कभी नहीं जाता था। पूरे घर की ज़िम्मेदारी रेखा के कंधों पर थी। रेखा दो बच्चों की माँ थी और वह चाहती थी कि बच्चों को कम से कम दसवीं कक्षा तक पढ़ा सके। बच्चे माँ की हालत समझते थे और दोनों माँ की मदद करते थे। रेखा हर घर में मुस्कुराते हुए काम करती थी। अपनी तकलीफ़ वह खुद ही सह लेती थी। दिन भर चार घरों में काम करने के कारण रेखा कई बार बीमार भी रहती थी। पीठ में दर्द, तेज़ बुखार रहने पर भी उसे काम पर जाना पड़ता था। उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। रेखा को मालिकों का गुस्सा और अपमानजनक बातें सहनी पड़ती थीं। कभी भी, किसी भी काम में कमी निकालकर मा...

कम्पनी : लघुकथा

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  AI Image -शमीमा हुसैन   जब मैं कम्पनी गई तो मुझे अजीब लगा। गेट पर दरवाज़ा छोड़कर, दरवाज़े के दोनों साइड बड़े-बड़े बोरे भरकर रखे हुए थे। पाँच-सात चालियों के बाद कम्पनी थी। आसपास कोई भी दुकान नहीं थी। कम्पनी की दीवार ऊँची और लम्बी थी, जिससे चोरी की संभावना कम लगती थी। गेट के अंदर जाते ही एक तरफ बहुत-सी कपड़ों की बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखी हुई थीं। दूसरी तरफ दीवार से सटा हुआ एक बड़ा टेबल था। उस टेबल के पास एक महिला और एक लड़की खड़े होकर शर्ट की मार्किंग कर रही थीं। दूसरी साइड में दस-बारह सिलाई मशीनें लगी थीं, जिन पर सिलाई मास्टर बैठकर काम कर रहे थे। उसी लाइन में बटन लगाने की मशीन थी, जिस पर माजिद बैठकर बटन लगा रहा था। मैं माजिद के पास जाकर बोली, “माजिद, कैसी उजाड़ कम्पनी है, कैसे मन लगता है यहाँ?” माजिद हँसने लगा और बोला, “भाभी, चाय मंगाता हूँ।” मैं भी ज़ोर से हँस पड़ी और बोली, “कभी बाद में चाय पिऊँगी, आज नहीं। आज तो कम्पनी देखने आई हूँ—माजिद कैसे काम करता है।” मैं कम्पनी देखने में व्यस्त हो गई। मशीनों की खटर-पटर की आवाज़ मिलकर एक शोर में बदल गई थी, क्योंकि एक साथ दस-बारह मशीनें चल ...

वीर खान : लघुकथा

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  AI Image -शमीमा हुसैन   वह एक वीर पुरुष है। उसका नाम है चमक ख़ान। नाम जैसा ही उसका कर्म भी है—जहाँ वह जाता है, जहाँ वह काम करता है, वहाँ उसका काम सचमुच चमक उठता है। चमक ख़ान अपने काम को केवल ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि इबादत समझता है। वह काम को लेकर अत्यंत गंभीर है। जो भी कार्य उसके हाथ में आता है, वह उसे पूरे मन, ईमानदारी और लगन से करता है। आज के इस स्वार्थी ज़माने में, जहाँ लोग काम से ज़्यादा फ़ायदे को महत्व देते हैं, वहाँ चमक ख़ान जैसे ईमानदार लोग बहुत कम मिलते हैं। उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी थी—उनकी माँ। माँ के संस्कार, माँ की नसीहतें और माँ की दुआएँ ही उसकी असली ताक़त हैं। माँ के इस दुनिया से चले जाने के बाद, उसकी कही हर बात और भी कीमती लगने लगी। चमक ख़ान अक्सर सोचता है कि जो कुछ भी उसने पाया है—नाम, शोहरत, इज़्ज़त और धन—सब माँ की दुआओं का असर है। उसने जो सपना देखा, उससे कहीं ज़्यादा उसे मिला। उसके जीवन में सफलता की मानो बरसात हो गई। लेकिन कहते हैं न, ज़िंदगी सिर्फ़ खुशियों का नाम नहीं होती। अब आप कहेंगे— “फिर हुआ क्या?” तो सुनिए— जिस घर के लिए चमक ख़ान ने अपनी ज़िंदगी लग...

काश : लघुकथा

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AI  शमीमा हुसैन सोनी के हाथ में चार हज़ार रुपये थे। सोनी की बेटी शीबा छठी कक्षा में पढ़ती है। स्कूल की हर महीने फीस जमा करनी पड़ती है, और उसके अलावा टर्म फीस भी देनी होती है। यह सब सोनी को बहुत भारी लगता है। इस बार टर्म फीस सात हज़ार रुपये भरनी थी। अगले महीने की पंद्रह तारीख़ को फीस जमा करनी थी। सोनी ने हिसाब लगाया—एक महीने में किसी तरह तीन हज़ार रुपये और आ सकते हैं। उसने अपनी ज़रूरतों को बाद के लिए टाल दिया और जो पैसे थे, उन्हें संभालकर रख लिया। दस-बारह हज़ार रुपये महीने कमाने वाले इंसान के लिए स्कूल की फीस और टर्म फीस भरना कितनी बड़ी मुसीबत होती है, यह सिर्फ़ माँ-बाप ही जानते हैं। सरकारी स्कूल है, सरकारी अस्पताल है—सब कुछ है, पर नाम भर का। सरकारी स्कूलों में ढंग की पढ़ाई नहीं होती। न चाहते हुए भी बच्चों को प्राइवेट स्कूल में दाख़िला कराना पड़ता है। माँ-बाप अपने बच्चों के लिए त्याग करते हैं। यह कोई नई बात नहीं है—यह आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से चला आ रहा है। मैं कोई नई माँ नहीं हूँ, सोचकर सोनी खुद को समझाती है। सोनी का पति सदीक कई साल पुरानी शर्ट पहन रहा है। जब भी सोनी कहती है...