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ताना : लघुकथा

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    AI IMAGE  -शमीमा हुसैन  कमर और युसुफ़ बहुत अच्छे दोस्त थे। कमर की बर्तन की दुकान थी और दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। युसुफ़ एक कंपनी में काम करता था। उसकी शादी हो चुकी थी, लेकिन अभी तक उसके कोई बच्चे नहीं थे। कमर के दो बच्चे थे—एक तीन साल की और दूसरा सात महीने का। दोनों दोस्त रोज़ एक बार ज़रूर मिलते थे। युसुफ़ सबसे खुश होकर बात करता था, वह बहुत मिलनसार इंसान था। युसुफ़ को बच्चों से बहुत प्यार था। वह रोज़ कमर के घर आता और घंटों बच्चों के साथ खेलता रहता। बच्चों के लिए वह कुछ न कुछ खाने की चीज़ ज़रूर लाता। तीनों मिलकर खुश होकर खाते और खेलते। दोस्ती के साथ-साथ दोनों बच्चे भी बड़े हो रहे थे। जब युसुफ़ जाने लगता, तो बच्चे रोने लगते। तीन साल की रूमी अपनी मासूम आवाज़ में कहती, “चाचा, अभी और रुको,” और गोद में बैठ जाती। यह रोज़ का खेल था। लेकिन कमर की बीवी को यह अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उसने कह दिया, “आप मेरे बच्चे को खराब कर रहे हैं।” यह ताना युसुफ़ के दिल में कील की तरह चुभ गया। वह कुछ पल वहीं खड़ा रहा, जैसे ज़मीन ने उसके पैर पकड़ लिए हों। उसने कमर की बीवी की तरफ़ द...

गुलाबी ठंड वाली सुबह : लघुकथा

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  AI  Image  शमीमा  हुसैन  गुलाबी ठंड की वह सुबह कुछ अलग ही थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा ऐसे लग रही थी, जैसे पूरे घर में फुहारों की मिठास घोल रही हो। किरन के पास कई काम थे। बेटे के पैंट की चेन टूटी थी, शर्ट का बटन निकला था। इसके अलावा और कई काम हाथ में था, फिर भी किरन सुबह छह बजे से चाय–नाश्ता बनाते हुए ऐसे फुदक रही थी जैसे मौसम ने उसमें नई जान डाल दी हो। आज हर काम जैसे खुद-ब-खुद हो रहे थे। एक हाथ से झाड़ू लगाती तो मन में लगता—चलो, एक कपड़ा भी निचोड़ दूँ। ठंड का मौसम ही ऐसा होता है—उत्साह से भरा हुआ। आठ बजते ही दिल में एक आवाज उठी— “आज गार्डन ज़रूर जाना है।” सप्ताह में दो बार जाना तय था, पर इस हफ्ते एक भी दिन न जा पाई थी। जल्दी-जल्दी सब काम निपटाकर,  और ठंडी हवा के साथ कदम बढ़ा दिए। गार्डन पहुँची तो हवा का पहला झोंका जैसे पूरे तन-मन पर फूल बिखेर गया। किरन ने गहरी साँस ली—मन हल्का हो गया। तभी दूर बेंच पर अफ़सा दिखाई दी। किरन की चाल तेज हो गई। “अस्सलाम अलैकुम!” “वअलैकुम सलाम!” दोनों सहेलियाँ पास-पास बैठ गईं। कुछ ही पल में बातों का सिलसिला खुल गया—घर की बातें, दुन...

इमानदार :लघुकथा

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AI  Image -शमीमा हुसैन  रोमन  एक कारपेंटर हैं। उसके अब्बा भी यही काम करते थे। अब्बा ने बेटे को कभी प्यार से, कभी सख़्ती से यह हुनर सिखाया था। उस कच्ची उम्र में अब्बा की बातें उसे बकवास लगती थीं, लेकिन आज उसे महसूस होता है कि अब्बा की हर बात अनमोल थी। इसी हुनर के बल पर रोमन आज अपना परिवार पाल रहा है। रोमन के तीन लड़कियाँ और एक लड़का है। उसकी कमाई से घर तो चल जाता है, लेकिन पैसा बचता नहीं है। रोमन के पास कोई सेविंग नहीं है। रोमन एक बहुत अच्छा कारपेंटर है। उसकी कला देखकर मन खुश हो जाता है। उसकी कारीगरी की चर्चा पूरे शहर में होती है। वह अपने काम में निपुण है। अब्बा ने उसे एक बात सिखाई थी—“बेटा, ईमानदार रहना, इसी में चैन-सुकून है।” आजकल के ज़माने में सच्चाई को बेकार की चीज़ समझा जाता है, लेकिन रोमन इस नसीहत को गले में पट्टी की तरह बाँधे हुए है। पिछले साल की बात है। शहर के एक सेठ ने उसे काम पर बुलाया और कहा कि हमारे घर का सारा फर्नीचर बना दो, जितना खर्च होगा बता देना। रोमन ने हिसाब लगाया और कहा—तीन लाख रुपये खर्च होंगे। सेठ ने उसे   काम दे दिया और रोमन काम करने लगा। ए...

दाई : लघुकथा

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AI Image    शमीमा हुसैन     अम्मा,  भादो आ गया है। “अम्मा, अम्मा, जुमेरात चला गया।” पुरानी टोला में सब इस जुमेरात को नियाज़ दिलाएँगे। “अम्मा, आप कब नियाज़ देंगी?” अम्मा खटिया पर लेटी है। कभी-कभी आँख खोलती है, फिर बंद कर लेती है। बच्चों की बातों में ज़रा भी रुचि नहीं है। उनके ज़ेहन में एक ही बात चल रही है—डाकिया कब आएगा। पिछले महीने तो सात तारीख को आया था। सुधि दुकानवाले का भी बहुत पैसा हो गया है। इस बार डाकबाबू बहुत देर लगा दिया है। अम्मा खटिया से उठकर आँगन में बर्तन माँजने लगती है। अनीस बाहर खेल रहा था। बच्चे फिर बेरा-बीबी, नियाज़ की बात करने लगे—कहाँ से फूल लाना है, कहाँ से थम्ब। कितना सुंदर, कितना बड़ा बेरा बनाना है—अनीस यह सब सुन रहा था। उसका रोने-रोने को हो गया। दौड़ता हुआ घर आया, अम्मा के पास आकर रोने लगा। अम्मा की चुप्पी टूटी। अनीस ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था— “अम्मा, हम सब बेरा-बीबी कब बनाएँगे?” अम्मा गुस्से में लाल होकर बोली— “पैसा आने दे, तब नियाज़ दिलाएँगे।” अनीस को बेरा-बीबी का पर्व बहुत अच्छा लगता था। इस पर्व में हल्ला-चिल्ला नहीं होता, शांति से पर्...

जनवरी : लघुकथा

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AI Image  -शमीमा हुसैन  रेखा बहुत मेहनती और हिम्मत वाली महिला है। वह लोगों के घरों में काम करती है। सब उसे घर का काम करने वाली बाई कहते हैं। वह चार घरों में काम करती है। रेखा सुबह से शाम तक दूसरों के घरों का काम करती रहती है। घर लौटकर वह अपने घर का काम भी करती है। देर रात तक उसे अपने घर का काम करना पड़ता है। पति से उसे कोई मदद नहीं मिलती थी। इस बात से वह अक्सर चिढ़ जाती थी। पति के इस रवैये से रेखा को बहुत कष्ट होता था। पति कभी काम पर जाता था, कभी नहीं जाता था। पूरे घर की ज़िम्मेदारी रेखा के कंधों पर थी। रेखा दो बच्चों की माँ थी और वह चाहती थी कि बच्चों को कम से कम दसवीं कक्षा तक पढ़ा सके। बच्चे माँ की हालत समझते थे और दोनों माँ की मदद करते थे। रेखा हर घर में मुस्कुराते हुए काम करती थी। अपनी तकलीफ़ वह खुद ही सह लेती थी। दिन भर चार घरों में काम करने के कारण रेखा कई बार बीमार भी रहती थी। पीठ में दर्द, तेज़ बुखार रहने पर भी उसे काम पर जाना पड़ता था। उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। रेखा को मालिकों का गुस्सा और अपमानजनक बातें सहनी पड़ती थीं। कभी भी, किसी भी काम में कमी निकालकर मा...

कम्पनी : लघुकथा

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  AI Image -शमीमा हुसैन   जब मैं कम्पनी गई तो मुझे अजीब लगा। गेट पर दरवाज़ा छोड़कर, दरवाज़े के दोनों साइड बड़े-बड़े बोरे भरकर रखे हुए थे। पाँच-सात चालियों के बाद कम्पनी थी। आसपास कोई भी दुकान नहीं थी। कम्पनी की दीवार ऊँची और लम्बी थी, जिससे चोरी की संभावना कम लगती थी। गेट के अंदर जाते ही एक तरफ बहुत-सी कपड़ों की बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखी हुई थीं। दूसरी तरफ दीवार से सटा हुआ एक बड़ा टेबल था। उस टेबल के पास एक महिला और एक लड़की खड़े होकर शर्ट की मार्किंग कर रही थीं। दूसरी साइड में दस-बारह सिलाई मशीनें लगी थीं, जिन पर सिलाई मास्टर बैठकर काम कर रहे थे। उसी लाइन में बटन लगाने की मशीन थी, जिस पर माजिद बैठकर बटन लगा रहा था। मैं माजिद के पास जाकर बोली, “माजिद, कैसी उजाड़ कम्पनी है, कैसे मन लगता है यहाँ?” माजिद हँसने लगा और बोला, “भाभी, चाय मंगाता हूँ।” मैं भी ज़ोर से हँस पड़ी और बोली, “कभी बाद में चाय पिऊँगी, आज नहीं। आज तो कम्पनी देखने आई हूँ—माजिद कैसे काम करता है।” मैं कम्पनी देखने में व्यस्त हो गई। मशीनों की खटर-पटर की आवाज़ मिलकर एक शोर में बदल गई थी, क्योंकि एक साथ दस-बारह मशीनें चल ...

वीर खान : लघुकथा

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  AI Image -शमीमा हुसैन   वह एक वीर पुरुष है। उसका नाम है चमक ख़ान। नाम जैसा ही उसका कर्म भी है—जहाँ वह जाता है, जहाँ वह काम करता है, वहाँ उसका काम सचमुच चमक उठता है। चमक ख़ान अपने काम को केवल ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि इबादत समझता है। वह काम को लेकर अत्यंत गंभीर है। जो भी कार्य उसके हाथ में आता है, वह उसे पूरे मन, ईमानदारी और लगन से करता है। आज के इस स्वार्थी ज़माने में, जहाँ लोग काम से ज़्यादा फ़ायदे को महत्व देते हैं, वहाँ चमक ख़ान जैसे ईमानदार लोग बहुत कम मिलते हैं। उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी थी—उनकी माँ। माँ के संस्कार, माँ की नसीहतें और माँ की दुआएँ ही उसकी असली ताक़त हैं। माँ के इस दुनिया से चले जाने के बाद, उसकी कही हर बात और भी कीमती लगने लगी। चमक ख़ान अक्सर सोचता है कि जो कुछ भी उसने पाया है—नाम, शोहरत, इज़्ज़त और धन—सब माँ की दुआओं का असर है। उसने जो सपना देखा, उससे कहीं ज़्यादा उसे मिला। उसके जीवन में सफलता की मानो बरसात हो गई। लेकिन कहते हैं न, ज़िंदगी सिर्फ़ खुशियों का नाम नहीं होती। अब आप कहेंगे— “फिर हुआ क्या?” तो सुनिए— जिस घर के लिए चमक ख़ान ने अपनी ज़िंदगी लग...