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जुर्माना : लघुकथा

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AI image -शमीमा हुसैन एक लंबे-पतले कद का आदमी था। उसके चेहरे पर घनी दाढ़ी थी। उसका रंग जामुनी था। वह हमेशा क्रीम कलर की शर्ट पहनता था और उसकी गंजी हमेशा चमकदार सफेद रहती थी। जामुनी और सफेद का कॉम्बिनेशन ही अच्छा लगता था। वह कभी-कभी रिक्शा चलाता, कभी खेतों में काम करता, कभी लकड़ी काटता और कभी शादी-ब्याह में हजाम का काम करता। उसके पास बच्चे थे। कुछ लोग कहते हैं कि उसका नाम रऊफ था। वह कभी-कभी पाव-रोटी और ब्रेड की दुकान पर भी काम करता था। रऊफ भिन्न-भिन्न तरह के काम करता था। काम में विविधता जितनी ज़्यादा होती है, ज़िंदगी उतनी ही मुश्किल होती है। अब मुझे इतनी बड़ी होने के बाद पता चला कि इतने सारे काम करने पर भी रऊफ की ज़िंदगी आसान नहीं थी। बहुत मुश्किलों से भरी हुई थी। उसकी मुश्किलों को शायद हम लिखें, तो न जाने कितने पन्ने भर जाएँ, कितने पढ़ने लग जाएँ, पर मैं अब बस इतना-सा कहना चाहती हूँ कि जब मैंने उसे देखा और सुना था कि उसने ऐसा कुछ भी किया है, तो मुझे बहुत गुस्सा आया था। लोगों ने उसे बहुत मारा था। क्रीम कलर की शर्ट काली पड़ गई थी और उस पर कहीं-कहीं खून के धब्बे भी पड़ गए थे। यह बात पुरानी...

अधूरी नहीं मैं : लघुकथा

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AI Image - नायला अदा भूरी आंखों वाली शमा को हमेशा दौड़ना पसंद था। कॉलेज के दिनों में वह एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती थी। उसके सपने भी उसकी रफ्तार जैसे थे-बड़े और चमकदार। लेकिन एक बरसाती शाम उसकी जिंदगी बदल गई। घर लौटते समय एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी स्कूटी को टक्कर मार दी। कई घंटों के ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि शमा के दोनों पैर बचाए नहीं जा सके। जब उसे होश आया और उसने अपने पैरों की जगह खाली बिस्तर देखा, तो लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया खत्म हो गई हो। कई महीनों तक वह कमरे में बंद रही। लोगों की सहानुभूति उसे दया जैसी लगती थी। रिश्तेदार कहते, "अब इसकी जिंदगी कैसे कटेगी?" एक दिन उसकी मां ने उसकी पुरानी डायरी उसके सामने रख दी। शमा ने पन्ने पलटे। उनमें उसकी कविताएं, कहानियां और सपने लिखे थे। उसी रात उसने फिर से लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे शब्द उसके नए कदम बन गए। वह व्हीलचेयर पर बैठकर घंटों लिखती। उसकी पहली कहानी एक पत्रिका में छपी तो पाठकों के सैकड़ों पत्र आए। फिर पहला उपन्यास आया, फिर दूसरा। कुछ ही वर्षों में शमा देश की चर्चित लेखिकाओं में गिनी जाने लगी। सफ...

गांव की लड़की : लघुकथा

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-नायला अदा हरियाली से भरा वह गांव खेतों और कच्ची पगडंडियों के लिए मशहूर था। गांव के किनारे बहती छोटी नदी के पास रोज शाम को बच्चों की चहल-पहल रहती थी। उसी गांव में पंद्रह साल की रमा रहती थी। सांवला चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें और तेज दिमाग- रमा पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ती थी और उसका सपना था कि वह बड़ी होकर अध्यापिका बने। रमा का परिवार गरीब था। पिता खेतिहर मजदूर थे और मां घर के साथ-साथ दूसरों के खेतों में काम करती थी। स्कूल से लौटने के बाद रमा अपनी सहेलियों के साथ गांव के बाहर बकरियां चराने जाती थी। यह उसका रोज का काम था। बकरियों को खुले मैदान में छोड़कर वे लड़कियां कभी पेड़ों के नीचे बैठकर बातें करतीं, कभी स्कूल का होमवर्क पूरा करतीं। रमा बाकी लड़कियों से अलग थी। वह खेल-कूद और हंसी-मजाक के बीच भी अपनी किताबें साथ ले जाती। उसकी सहेलियां अक्सर कहतीं, “अरे रमा, तू हर समय पढ़ाई ही करती रहती है।” रमा मुस्कुरा कर जवाब देती, “पढ़-लिख लेंगे तो जिंदगी बदल जाएगी।” एक दिन जब वे सब बकरियां चरा रही थीं, तभी गांव का एक युवक वहां आ पहुंचा। उसका नाम मोहन था। उम्र लगभग पच्च...

लघुकथा : आशा और निराशा

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AI Image -नायला अदा इस शहर की सुबह आज कुछ अलग ही थी। हर गलियों में हलचल थी, दीवारों पर लगे पोस्टर हवा में फड़फड़ा रहे थे और मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही थीं। लेकिन सबसे ज्यादा चमक एक लड़की की आँखों में थी, क्योंकि आज वह पहली बार वोट देने जा रही थी। उसने कई दिनों तक हर उम्मीदवार और पार्टी के बारे में पढ़ा था। वह ऐसे लोगों को चुनना चाहती थी जो धर्म, जाति और नफरत की बातें न करें, बल्कि लोगों को जोड़ें। उसके मन में एक ही सपना था- ऐसा समाज जहाँ लड़कियाँ बिना डर के पढ़ सकें, आगे बढ़ सकें और अपने फैसले खुद ले सकें। सुबह जल्दी उठकर उसने बड़े उत्साह से अपनी उंगली पर स्याही लगवाई और वोट डाल दिया। मतदान केंद्र से बाहर निकलते समय उसके चेहरे पर गर्व था। उसे लगा, जैसे उसने देश के भविष्य में अपना छोटा-सा योगदान दे दिया हो। पूरा दिन वह टीवी और मोबाइल पर खबरें देखती रही। एग्ज़िट पोल देखकर उसके मन में उम्मीद और बढ़ गई। उसे पूरा विश्वास था कि वही पार्टी जीतेगी, जिसे उसने चुना था। लेकिन नतीजे आने शुरू हुए तो उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। जिन लोगों और विचारों के खिलाफ वह थी, वही ...

एक मौका : लघुकथा

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  AI Image ...जब इंसान अपने ही जुड़े हुए लोगों को माफ नहीं कर पाता, तो रिश्ता सड़ने लगता है और उसमें से बदबू आने लगती है। चाहे जीवन कितना भी आधुनिक क्यों न हो, लेकिन उस घर में दोनों अजनबियों की तरह रहने लगे थे। (इसी कहानी से) शमीमा हुसैन नफीसा और सलमान की एक खूबसूरत जोड़ी थी। नफीसा आधुनिक विचारों वाली महिला थी। शादी के दिन से ही वह घर को अपने तरीके से चलाती आ रही थी। नफीसा अपने कपड़ों से लेकर बर्तनों तक सब कुछ आधुनिक रखना पसंद करती थी। इसी बात को लेकर सास और बहू में अक्सर तकरार हो जाती थी। जिस घर को नफीसा कुछ सालों से संभाल रही थी, उस घर को उसकी सास कई दशकों से चला रही थीं। सास का कहना था कि नफीसा का दिमाग खराब हो गया है, वह फिजूल खर्ची करती है। लेकिन नफीसा का मानना था कि हमें नए समय के साथ जीना चाहिए और पुरानी चीजों को बदल देना चाहिए। नफीसा के सारे कपड़े वेस्टर्न थे, इस बात से भी सास को खीज होती थी। नफीसा पिछले कुछ सालों से अपनी एक दुकान भी चला रही थी। इस बात पर भी घर में एतराज़ होता था। सास कहती थीं कि जब अल्लाह का दिया सब कुछ है तो काम करने की क्या ज़रूरत है। लेकिन नफीसा का कहना...

चुप्पी की आवाज़ : लघुकथा

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AI Image आज सारा थोड़ी देर से उठी थी, लेकिन इसके पीछे भी एक वजह थी। कल अम्मी बाज़ार से अंगूर लाई थीं। भाई को ज़्यादा अंगूर मिले और सारा को बहुत कम। जब सारा ने हिम्मत करके कहा,“अम्मी, मुझे भी थोड़ा और दे दीजिए,”तो उसे जवाब में डांट और मार मिली। वहीं भाई को बिना कुछ कहे तीन रुपये दे दिए गए। शमीमा हुसैन सारा चुपचाप खड़ी थी।अम्मी की कठोर आवाज़ उसके कानों में गूंज रही थी। “सारा, तुम पूरे दिन बस खाती रहती हो। तुम्हें कोई काम नहीं सूझता। अगर यही आदत रही तो रोज़ मार खानी पड़ेगी।” सारा कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि एक शब्द भी बोलने से अम्मी का गुस्सा और बढ़ जाएगा। वह अभी सिर्फ़ नौ साल की थी, लेकिन इतनी छोटी उम्र में ही उसने चुप रहना सीख लिया था। सारा का भाई उससे दो साल बड़ा था। घर में उसके लिए कोई नियम नहीं थे। वह दिन भर सोए, खेले या खाए—किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। भले ही वह अभी बच्चा था, लेकिन उसे घर में बड़े पुरुष जैसा सम्मान मिलता था। उसकी हर गलती माफ़ कर दी जाती थी। आज सारा थोड़ी देर से उठी थी, लेकिन इसके पीछे भी एक वजह थी। कल अम्मी बाज़ार से अंगूर लाई थीं। भाई को ज़्यादा अंगूर मिले और सा...

कोरोना काल

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AI Image कोरोना ने जो करना था, वह किया। पति का काम छूट गया। पहले का जमा-पूंजी लॉकडाउन के पहले ही महीने में खत्म हो गया। ऐसी मुसीबत पहले कभी नहीं आई थी। शमीमा हुसैन एक दिन में हुमा भाभी पचास आदमियों का खाना पका लेती है। कोरोना के समय जिंदगी ने उसे जीवन का एक नया पाठ पढ़ाया। वह पाठ नया भी था और बहुत तकलीफदेह भी था। हुमा ने भी वह सबक सीखा। कई दिन ऐसे भी आए जब घर में मुट्ठी भर भी चावल नहीं था। हुमा की एक आदत है—वह बड़ी से बड़ी मुसीबत भी किसी को नहीं बताती। अपनी माँ को भी अपना दुःख नहीं बताती। वह बस एक ही बात याद रखती है—अल्लाह मेरे साथ है। कोरोना ने जो करना था, वह किया। पति का काम छूट गया। पहले का जमा-पूंजी लॉकडाउन के पहले ही महीने में खत्म हो गया। ऐसी मुसीबत पहले कभी नहीं आई थी। आदमी से आदमी बहुत डरने लगा था। दिन भर में हाथ दस बार धोना पड़ता था। तब खाना और पैसे की असली कीमत पता चली। दो दिन से घर में कुछ भी पका नहीं था। बच्चों का भूख से बुरा हाल था। बच्चे टीनएज के थे। हुमा से अपने बच्चों को भूख से बेहाल देखना सहा नहीं जा रहा था। तीसरे दिन वह पड़ोसी के घर चावल माँगने गई। चावल में नमक डालकर...