भूख की मजबूरी : लघुकथा
AI Image -शमीमा हुसैन कई दिन हो गए थे, मुकेश ने कोई सब्जी नहीं खाई थी। आलू, प्याज और मिर्च देखे हुए भी लगभग दो महीने बीत चुके थे। घर में आटा और चावल तो थे, लेकिन सब्जी खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मुकेश को पिछले साल की याद आई। पिछले साल वकील साहब के खेत में बैंगन की खेती हुई थी। बैंगन के साथ-साथ मिर्च भी लगाई गई थी। तब बैंगन और मिर्च का भरता बनाकर खाते थे। कभी रोटी के साथ तो कभी चावल के साथ। कितना अच्छा लगता था! लेकिन इस साल सब कुछ बदल गया था। यही सब सोचते हुए मुकेश सूखी रोटी खा रहा था। उसके सामने न कोई सब्जी थी, न दाल। कभी-कभी चावल में नमक डालकर उसका गोला बना लेते और उसी से पेट भरने की कोशिश करते। अब तो बच्चे भी सूखी रोटी खाते-खाते परेशान हो गए थे। खाने के लिए रोटी दी जाती, तो वे रोने लगते। उनका मन भी नहीं करता था कि रोज वही सूखी रोटी खाएँ। मुकेश का अपना मन भी खाना खाने को नहीं करता था। लेकिन वह करता भी क्या? घर की मजबूरियाँ इतनी थीं कि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था। आटा और चावल होने के बावजूद घर में सब्जी नहीं थी। पैसे होते, तो सब्जी खरीदकर लाता। लेकिन पैसे आते कहाँ से? पहले गाँव के आस...