लघुकथा: मौन
AI Image -नायला अदा मुंबई की एक व्यस्त सड़क के किनारे, फुटपाथ पर एक फटे कंबल के सहारे दिन गुज़ारने वाला एक बूढ़ा भिखारी पड़ा रहता था। सुबह होते ही वह उठकर आस-पास की दुकानों के सामने फैल जाता—कबीर चायवाला, सेठी जनरल स्टोर्स, फिर दवा की दुकान... सब उसकी दिनचर्या के गवाह थे। कोई उसे सिक्का देता, कोई नज़रें फेर लेता, तो कोई तिरस्कार भरी बात कहकर भगा देता। मगर वह सब सह लेता—क्योंकि उसके पास खोने को अब कुछ बचा ही कहाँ था। फुटपाथ उसका घर था, आसमान उसकी छत। दोपहर तक वह फुटपाथ पर लौट आता और चाय की ठंडी प्याली को दोनों हथेलियों में दबाए देर तक बैठा रहता। उसकी आँखों में अक्सर एक दूर का शून्य तैरता—जैसे कुछ खोज रहा हो, जो बहुत पीछे छूट गया हो। उस दिन भी ऐसा ही था। दुकानें खुल चुकी थीं, सड़क पर गाड़ियों की तेज़ रफ्तार आ-जा रही थी। वह वहीं बैठा था कि एक चमचमाती कार ठीक सामने आकर रेड सिग्नल पर रुकी। कार में बैठा युवक फोन पर कुछ बात कर रहा था—चेहरे की बनावट, आँखों की आकृति, आँखों के नीचे का हल्का तिल… बूढ़ा सिहर उठा। यह उसका बेटा था—वही बेटा जिसने कभी उसका हाथ थामकर सायकल सीखी थी, वही जिसने पहली...