मास्टर साहब : लघुकथा

 

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शमीमा हुसैन


सुबह के चार बजे थे। मास्टर साहब के घर में खूब हल्ला मच रहा था। उनके घर में आम तौर पर छह बजे चहल-पहल होती है, लेकिन  आज भोर के चार बजे ही शोर होने लगा।


मास्टर साहब की बीबी यूरोप घूमकर आई है,  मास्टर साहब का बेटा यूरोप में नौकरी करता है और अपने परिवार को वहीं साथ रखता है। उसने माँ-बाप को भी यूरोप घुमाया। महल्ले में यह रिवाज है कि जिसका पति जो काम करता है, उसी नाम से उसकी बीबी भी जानी जाती है।


मास्टरनी ने चार बकरियाँ पाल रखी हैं। सुबह से रात तक वह बकरियों में ही लगी रहती है। बकरी का पालन-पोषण कैसे करना है, यह पूरे महल्ले को समझाती रहती है। वह भले ही किताबी मास्टरनी न हो, लेकिन बकरी पालने की मास्टरी उसे खूब आती है। एक बेटा और बहू उसके साथ रहते हैं। बेचारी बहू पूरे घर को संभालती है।


मास्टरनी दिन-रात बकरियों की सेवा करती है, पर घर में एक गिलास तक नहीं उठाती। घर में वह असली सास बनी रहती है, लेकिन बकरियों के लिए अम्मा बनी रहती है। उसके लिए बकरी पालना मेहनत नहीं, बल्कि बकरियों के साथ मस्ती करना है।


घर में सब कुछ किया-धरा रहता है, इसलिए उसके पास समय भी खूब रहता है। लेकिन बारिश के मौसम में थोड़ी परेशानी शुरू हो जाती है। इसी महीने के लिए मास्टरनी बोरा भर-भर कर मकई रखती थी। बड़े तसले में मकई का दाना पकाया जाता था। फिर भी बकरियों का पेट पूरा नहीं भरता था। तब मास्टरनी अपनी बकरियों से बात करती और कहती— “गर्मी आने दो, फिर जाड़ा आने दो, तुम्हें अच्छा खिलाऊँगी।”


बाहर झमाझम बारिश होती और घर में मास्टरनी मीठी-मीठी बातें करती। बकरियाँ “में-में” करके जैसे उसकी बातों में हाँ में हाँ मिलाती रहतीं। बकरियों को बहुत प्यार से पाला जाता था। बकरी और बकरा दोनों खूब हट्टे-कट्टे रहते थे। उन्हें देखकर देखने वालों की नजर ठहर जाती थी। मास्टरनी को बकरी पालने  की  बहुत शौक था।


मास्टर साहब की पड़ोसन नादिरा भी बकरी पालती थी, लेकिन उसकी बकरियाँ उतनी रूपवती नहीं थीं। इस बार मास्टर साहब के यहाँ दो बकरे कुर्बानी के लिए थे।


एक दिन सुबह पूरा घर नादिरा के दरवाजे पर जाकर उसे खूब गालियाँ देने लगा— “नादिरा हरामी, हरामजादी, डायन!” और भी भारी-भारी गालियाँ दी जा रही थीं। कहा जा रहा था— “डायन नादिरा, मेरा बकरा खा गई।”


बेचारी नादिरा रो रही थी। मास्टरनी पूरे जोश में गालियाँ दे रही थी और कह रही थी— “मेरा बकरा इसी नादिरा की नजर से मरा है। यह बहुत आँख गड़ाकर देख रही थी। इसी ने नजर लगा दी।”


असल में रात में अचानक बकरा जोर-जोर से मिमियाने लगा। मास्टरनी दौड़कर बकरियों के घर में गई। उसने देखा कि बकरा जमीन पर चारों पैर फैलाकर तड़प रहा है। मास्टरनी ने उसे प्यार से सहलाया और पानी भी पिलाया। मास्टर साहब मवेशियों के डॉक्टर को बुलाने गए, लेकिन तब तक बकरा तड़प-तड़प कर मर चुका था।


मुझे यह बात समझ में नहीं आई कि बकरा किस कारण से मरा— जहरीली घास खाने से, या सांप-बिच्छू के काटने से, या किसी और वजह से। किसी ने असली कारण खोजने की जहमत ही नहीं उठाई। बेचारी नादिरा पर ही आरोप लगा दिया गया और उसे डायन कहकर मास्टर साहब गालियाँ देते रहे।


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