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Showing posts from November 23, 2025

जकीना की 'लाली' : लघुकथा

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AI Image शमीमा हुसैन जकीना! अरे जकीना, लाली को मार मत पिलाना। जकीना की अम्मा हाथ में खुरपी और बोरा लेकर दरवाज़े के बाहर निकलते हुए उसे समझा रही थी। माघ का महीना था। जकीना के पास चार बकरियाँ थीं—चितकबरी, लाली, पीली और एक और।  माघ का महीना गरीबों और बूढ़ों के लिए बहुत दुःख का महीना होता है, यह बात सब जानते हैं। पर लाली और फागी भैंस जैसी मवेशियों की तकलीफ़ की बात कोई नहीं करता। इसी बीच जकीना की बकरी “लाली” कई दिनों से बीमार थी। आज तो उसका मुँह भी सूजा हुआ था। लाली के दो छोटे बच्चे थे, दोनों अब भी दूध पीते थे। वे अभी बहुत छोटे थे। सारी बकरियों की देखभाल जकीना ही करती थी। जकीना के दो भाई थे, लेकिन वे कभी बकरी को हाथ तक नहीं लगाते थे। अब्बा कभी-कभार मदद कर देते थे। कहीं कटहल का पत्ता दिख गया, तो माँगकर ले आते थे। घर की बकरियों की पूरी जिम्मेदारी जकीना ही उठाती थी। हाड़ तोड़ ठंड में भी, कुहासा थोड़ा कम होते ही, शाल-स्वेटर पहने, वह बकरियों को नहर किनारे चराने ले जाती थी। जकीना अपनी बकरियों का बहुत ध्यान रखती थी। लेकिन माघ का महीना! बड़े-बड़े मवेशियों की हालत खराब हो जाती है। न जाने लाली को...

किराएदार : लघुकथा

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                                                                       AI Image शमीमा हुसैन एक शहरी अफसर का तबादला एक छोटे से कस्बे  में हो गया। साहब ने अपनी पावर का पूरा उपयोग किया ताकि तबादला रुक जाए, पर साहब की पावर विफल हो गई। तबादले के बाद साहब को घर खोजना था। कई मकानों को देखने के बाद साहब को एक मकान पसंद आया। मकान अच्छा था, बड़ा भी था। लेकिन मकान मालकिन के तेवर-गेवर कुछ अलग ही थे। वह भाड़ा ज्यादा बोल रही थी, और समय से पहले ही भाड़ा उसे चाहिए था। यह बात साहब को बहुत अखर रहा था। साहब ने सोच लिया कि इसे कोई बहाना देकर दूसरे मकान को खोज लूंगा। भाड़ा भी कम नहीं कर रही है। मकान के साथ में एक सटा हुआ बगीचा था। छोटा था, पर उसमें तरकारी, अमरूद, पपीता और एलोवेरा के पेड़ थे। साहब ने सवाल किया, "यह बगीचा किसका है?" मकान मालकिन ने कहा, "मेरा है। जिसको भाड़े पर मकान देती हूं, किरायेदार ही बगीचे की देखभाल करता है...