गुलाबी ठंड वाली सुबह : लघुकथा
AI Image शमीमा हुसैन गुलाबी ठंड की वह सुबह कुछ अलग ही थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा ऐसे लग रही थी, जैसे पूरे घर में फुहारों की मिठास घोल रही हो। किरन के पास कई काम थे। बेटे के पैंट की चेन टूटी थी, शर्ट का बटन निकला था। इसके अलावा और कई काम हाथ में था, फिर भी किरन सुबह छह बजे से चाय–नाश्ता बनाते हुए ऐसे फुदक रही थी जैसे मौसम ने उसमें नई जान डाल दी हो। आज हर काम जैसे खुद-ब-खुद हो रहे थे। एक हाथ से झाड़ू लगाती तो मन में लगता—चलो, एक कपड़ा भी निचोड़ दूँ। ठंड का मौसम ही ऐसा होता है—उत्साह से भरा हुआ। आठ बजते ही दिल में एक आवाज उठी— “आज गार्डन ज़रूर जाना है।” सप्ताह में दो बार जाना तय था, पर इस हफ्ते एक भी दिन न जा पाई थी। जल्दी-जल्दी सब काम निपटाकर, और ठंडी हवा के साथ कदम बढ़ा दिए। गार्डन पहुँची तो हवा का पहला झोंका जैसे पूरे तन-मन पर फूल बिखेर गया। किरन ने गहरी साँस ली—मन हल्का हो गया। तभी दूर बेंच पर अफ़सा दिखाई दी। किरन की चाल तेज हो गई। “अस्सलाम अलैकुम!” “वअलैकुम सलाम!” दोनों सहेलियाँ पास-पास बैठ गईं। कुछ ही पल में बातों का सिलसिला खुल गया—घर की बातें, दुन...