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Showing posts from April 5, 2026

कोरोना काल

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AI Image कोरोना ने जो करना था, वह किया। पति का काम छूट गया। पहले का जमा-पूंजी लॉकडाउन के पहले ही महीने में खत्म हो गया। ऐसी मुसीबत पहले कभी नहीं आई थी। शमीमा हुसैन एक दिन में हुमा भाभी पचास आदमियों का खाना पका लेती है। कोरोना के समय जिंदगी ने उसे जीवन का एक नया पाठ पढ़ाया। वह पाठ नया भी था और बहुत तकलीफदेह भी था। हुमा ने भी वह सबक सीखा। कई दिन ऐसे भी आए जब घर में मुट्ठी भर भी चावल नहीं था। हुमा की एक आदत है—वह बड़ी से बड़ी मुसीबत भी किसी को नहीं बताती। अपनी माँ को भी अपना दुःख नहीं बताती। वह बस एक ही बात याद रखती है—अल्लाह मेरे साथ है। कोरोना ने जो करना था, वह किया। पति का काम छूट गया। पहले का जमा-पूंजी लॉकडाउन के पहले ही महीने में खत्म हो गया। ऐसी मुसीबत पहले कभी नहीं आई थी। आदमी से आदमी बहुत डरने लगा था। दिन भर में हाथ दस बार धोना पड़ता था। तब खाना और पैसे की असली कीमत पता चली। दो दिन से घर में कुछ भी पका नहीं था। बच्चों का भूख से बुरा हाल था। बच्चे टीनएज के थे। हुमा से अपने बच्चों को भूख से बेहाल देखना सहा नहीं जा रहा था। तीसरे दिन वह पड़ोसी के घर चावल माँगने गई। चावल में नमक डालकर...

मास्टर साहब : लघुकथा

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  AI Image शमीमा हुसैन सुबह के चार बजे थे। मास्टर साहब के घर में खूब हल्ला मच रहा था। उनके घर में आम तौर पर छह बजे चहल-पहल होती है, लेकिन  आज भोर के चार बजे ही शोर होने लगा। मास्टर साहब की बीबी यूरोप घूमकर आई है,  मास्टर साहब का बेटा यूरोप में नौकरी करता है और अपने परिवार को वहीं साथ रखता है। उसने माँ-बाप को भी यूरोप घुमाया। महल्ले में यह रिवाज है कि जिसका पति जो काम करता है, उसी नाम से उसकी बीबी भी जानी जाती है। मास्टरनी ने चार बकरियाँ पाल रखी हैं। सुबह से रात तक वह बकरियों में ही लगी रहती है। बकरी का पालन-पोषण कैसे करना है, यह पूरे महल्ले को समझाती रहती है। वह भले ही किताबी मास्टरनी न हो, लेकिन बकरी पालने की मास्टरी उसे खूब आती है। एक बेटा और बहू उसके साथ रहते हैं। बेचारी बहू पूरे घर को संभालती है। मास्टरनी दिन-रात बकरियों की सेवा करती है, पर घर में एक गिलास तक नहीं उठाती। घर में वह असली सास बनी रहती है, लेकिन बकरियों के लिए अम्मा बनी रहती है। उसके लिए बकरी पालना मेहनत नहीं, बल्कि बकरियों के साथ मस्ती करना है। घर में सब कुछ किया-धरा रहता है, इसलिए उसके पास समय भी खूब रह...

ईदी : लघुकथा

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AI Image -शमीमा हुसैन आज ईद का दिन है। चारों तरफ खुशियों का मंजर है, लेकिन सफूर और रफ़ीक दोनों भाई आज दूर-दूर हैं।  एक महीने के रोज़ों के बाद यह दिन आया है। हर कोई खुश है। एक महीने की मेहनत और संयम का फल है आज का दिन। रोज़ा, नमाज़, सहरी, इफ्तारी और तरावीह जैसी इबादतों के बाद आज ईद आई है। हर कोई खुश है, क्योंकि ऐसी खुशी पूरे साल में शायद ही कभी देखने को मिलती है। ईद मनाने की इतनी उत्सुकता होती है कि रमजान के दौरान रोज़ बाज़ार सजते हैं। लोग नए कपड़े और  खरीदने के लिए बाज़ार जाते हैं। महीने भर रोज़ा और इबादत करके लोग नेकी का खज़ाना जमा करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह नेकी और बरकत का महीना होता है। कम खाने और ज्यादा इबादत करने से दिल भी नर्म हो जाता है। सफूर और रफ़ीक दोनों भाई का एक ही आंगन था। दोनों भाइयों के बच्चे साथ खेलते, साथ खाते और कभी-कभी साथ झगड़ भी लेते थे। इसी तरह दिन बीत रहे थे और बच्चे बड़े हो रहे थे। लेकिन एक दिन बच्चों के झगड़े ने उस एक आंगन को दो आंगन बना दिया। सहीद और जमाल के बीच जोरदार लड़ाई हो गई। जमाल का माथा फूट गया और खून बहने लगा। जमाल सफूर क...