काश : लघुकथा
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शमीमा हुसैन
सोनी के हाथ में चार हज़ार रुपये थे। सोनी की बेटी शीबा छठी कक्षा में पढ़ती है। स्कूल की हर महीने फीस जमा करनी पड़ती है, और उसके अलावा टर्म फीस भी देनी होती है। यह सब सोनी को बहुत भारी लगता है।
इस बार टर्म फीस सात हज़ार रुपये भरनी थी। अगले महीने की पंद्रह तारीख़ को फीस जमा करनी थी। सोनी ने हिसाब लगाया—एक महीने में किसी तरह तीन हज़ार रुपये और आ सकते हैं। उसने अपनी ज़रूरतों को बाद के लिए टाल दिया और जो पैसे थे, उन्हें संभालकर रख लिया।
दस-बारह हज़ार रुपये महीने कमाने वाले इंसान के लिए स्कूल की फीस और टर्म फीस भरना कितनी बड़ी मुसीबत होती है, यह सिर्फ़ माँ-बाप ही जानते हैं।
सरकारी स्कूल है, सरकारी अस्पताल है—सब कुछ है, पर नाम भर का। सरकारी स्कूलों में ढंग की पढ़ाई नहीं होती। न चाहते हुए भी बच्चों को प्राइवेट स्कूल में दाख़िला कराना पड़ता है।
माँ-बाप अपने बच्चों के लिए त्याग करते हैं। यह कोई नई बात नहीं है—यह आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से चला आ रहा है। मैं कोई नई माँ नहीं हूँ, सोचकर सोनी खुद को समझाती है।
सोनी का पति सदीक कई साल पुरानी शर्ट पहन रहा है। जब भी सोनी कहती है कि नई शर्ट ले लो, वह बस एक ही बात कहता है,
“बाद में ले लूँगा।”
लेकिन सदीक में एक अच्छी बात है—अगर उसके पास पैसा हो और कोई माँग ले, तो वह मना नहीं करता, झूठ नहीं बोलता।
एक दिन सदीक के दोस्त ने उससे पैसे माँगे। सदीक ने सोनी से कहा,
“सोनी, पैसे देना एक नेक काम है।”
यह सुनकर सोनी गुस्से में आँखें तरेरते हुए बोली,
“मैं क्या करूँ—काम है या नहीं है? घर का खर्च, बच्ची की फीस… सब मुझे ही दिखता है!”
सदीक ने उसे मनाते हुए कहा,
“सोनी, दो हज़ार रुपये दे दो। मालकिन, मेरा दोस्त है—दस दिन में लौटा देगा।”
सोनी पूरी तरह भड़क गई।
“अच्छा! आपको भलाई का कीड़ा काट रहा है? क्या मैं ही हर बार पैसे दूँ?”
फिर भी सदीक ने उससे पैसे ले लिए और दोस्त को दे दिए। दोस्त ने भी कहा,
“दस दिन में दे दूँगा।”
दस दिन बीत गए। सोनी ने याद दिलाया।
“पैसे मिले?”
सदीक बोला,
“नहीं, आज भूल गया। कल दे देगा।”
सोनी चुप हो गई। चार दिन बाद फिर याद आया। उसने दोबारा कहा।
सदीक बोला,
“मैंने बोला है। दो दिन में देगा।”
इसी तरह दो-पाँच दिन टलते रहे। देखते-देखते टर्म फीस भरने का दिन आ गया, और पैसे नहीं आए।
सोनी रोते हुए बोली,
“अब बताओ क्या करें? तुम्हारी भलाई हमें मार डालेगी।”
आख़िरकार सोनी ने अपने कान के फूल गिरवी रख दिए और टर्म फीस भर दी।
सदीक मन ही मन सोचने लगा—
“अब किसी की मदद नहीं करूँगा। काश, वह समय पर पैसे लौटा देता।”

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