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Showing posts from January 4, 2026

जनवरी : लघुकथा

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AI Image  -शमीमा हुसैन  रेखा बहुत मेहनती और हिम्मत वाली महिला है। वह लोगों के घरों में काम करती है। सब उसे घर का काम करने वाली बाई कहते हैं। वह चार घरों में काम करती है। रेखा सुबह से शाम तक दूसरों के घरों का काम करती रहती है। घर लौटकर वह अपने घर का काम भी करती है। देर रात तक उसे अपने घर का काम करना पड़ता है। पति से उसे कोई मदद नहीं मिलती थी। इस बात से वह अक्सर चिढ़ जाती थी। पति के इस रवैये से रेखा को बहुत कष्ट होता था। पति कभी काम पर जाता था, कभी नहीं जाता था। पूरे घर की ज़िम्मेदारी रेखा के कंधों पर थी। रेखा दो बच्चों की माँ थी और वह चाहती थी कि बच्चों को कम से कम दसवीं कक्षा तक पढ़ा सके। बच्चे माँ की हालत समझते थे और दोनों माँ की मदद करते थे। रेखा हर घर में मुस्कुराते हुए काम करती थी। अपनी तकलीफ़ वह खुद ही सह लेती थी। दिन भर चार घरों में काम करने के कारण रेखा कई बार बीमार भी रहती थी। पीठ में दर्द, तेज़ बुखार रहने पर भी उसे काम पर जाना पड़ता था। उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। रेखा को मालिकों का गुस्सा और अपमानजनक बातें सहनी पड़ती थीं। कभी भी, किसी भी काम में कमी निकालकर मा...

कम्पनी : लघुकथा

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  AI Image -शमीमा हुसैन   जब मैं कम्पनी गई तो मुझे अजीब लगा। गेट पर दरवाज़ा छोड़कर, दरवाज़े के दोनों साइड बड़े-बड़े बोरे भरकर रखे हुए थे। पाँच-सात चालियों के बाद कम्पनी थी। आसपास कोई भी दुकान नहीं थी। कम्पनी की दीवार ऊँची और लम्बी थी, जिससे चोरी की संभावना कम लगती थी। गेट के अंदर जाते ही एक तरफ बहुत-सी कपड़ों की बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखी हुई थीं। दूसरी तरफ दीवार से सटा हुआ एक बड़ा टेबल था। उस टेबल के पास एक महिला और एक लड़की खड़े होकर शर्ट की मार्किंग कर रही थीं। दूसरी साइड में दस-बारह सिलाई मशीनें लगी थीं, जिन पर सिलाई मास्टर बैठकर काम कर रहे थे। उसी लाइन में बटन लगाने की मशीन थी, जिस पर माजिद बैठकर बटन लगा रहा था। मैं माजिद के पास जाकर बोली, “माजिद, कैसी उजाड़ कम्पनी है, कैसे मन लगता है यहाँ?” माजिद हँसने लगा और बोला, “भाभी, चाय मंगाता हूँ।” मैं भी ज़ोर से हँस पड़ी और बोली, “कभी बाद में चाय पिऊँगी, आज नहीं। आज तो कम्पनी देखने आई हूँ—माजिद कैसे काम करता है।” मैं कम्पनी देखने में व्यस्त हो गई। मशीनों की खटर-पटर की आवाज़ मिलकर एक शोर में बदल गई थी, क्योंकि एक साथ दस-बारह मशीनें चल ...

वीर खान : लघुकथा

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  AI Image -शमीमा हुसैन   वह एक वीर पुरुष है। उसका नाम है चमक ख़ान। नाम जैसा ही उसका कर्म भी है—जहाँ वह जाता है, जहाँ वह काम करता है, वहाँ उसका काम सचमुच चमक उठता है। चमक ख़ान अपने काम को केवल ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि इबादत समझता है। वह काम को लेकर अत्यंत गंभीर है। जो भी कार्य उसके हाथ में आता है, वह उसे पूरे मन, ईमानदारी और लगन से करता है। आज के इस स्वार्थी ज़माने में, जहाँ लोग काम से ज़्यादा फ़ायदे को महत्व देते हैं, वहाँ चमक ख़ान जैसे ईमानदार लोग बहुत कम मिलते हैं। उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी थी—उनकी माँ। माँ के संस्कार, माँ की नसीहतें और माँ की दुआएँ ही उसकी असली ताक़त हैं। माँ के इस दुनिया से चले जाने के बाद, उसकी कही हर बात और भी कीमती लगने लगी। चमक ख़ान अक्सर सोचता है कि जो कुछ भी उसने पाया है—नाम, शोहरत, इज़्ज़त और धन—सब माँ की दुआओं का असर है। उसने जो सपना देखा, उससे कहीं ज़्यादा उसे मिला। उसके जीवन में सफलता की मानो बरसात हो गई। लेकिन कहते हैं न, ज़िंदगी सिर्फ़ खुशियों का नाम नहीं होती। अब आप कहेंगे— “फिर हुआ क्या?” तो सुनिए— जिस घर के लिए चमक ख़ान ने अपनी ज़िंदगी लग...

काश : लघुकथा

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AI  शमीमा हुसैन सोनी के हाथ में चार हज़ार रुपये थे। सोनी की बेटी शीबा छठी कक्षा में पढ़ती है। स्कूल की हर महीने फीस जमा करनी पड़ती है, और उसके अलावा टर्म फीस भी देनी होती है। यह सब सोनी को बहुत भारी लगता है। इस बार टर्म फीस सात हज़ार रुपये भरनी थी। अगले महीने की पंद्रह तारीख़ को फीस जमा करनी थी। सोनी ने हिसाब लगाया—एक महीने में किसी तरह तीन हज़ार रुपये और आ सकते हैं। उसने अपनी ज़रूरतों को बाद के लिए टाल दिया और जो पैसे थे, उन्हें संभालकर रख लिया। दस-बारह हज़ार रुपये महीने कमाने वाले इंसान के लिए स्कूल की फीस और टर्म फीस भरना कितनी बड़ी मुसीबत होती है, यह सिर्फ़ माँ-बाप ही जानते हैं। सरकारी स्कूल है, सरकारी अस्पताल है—सब कुछ है, पर नाम भर का। सरकारी स्कूलों में ढंग की पढ़ाई नहीं होती। न चाहते हुए भी बच्चों को प्राइवेट स्कूल में दाख़िला कराना पड़ता है। माँ-बाप अपने बच्चों के लिए त्याग करते हैं। यह कोई नई बात नहीं है—यह आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से चला आ रहा है। मैं कोई नई माँ नहीं हूँ, सोचकर सोनी खुद को समझाती है। सोनी का पति सदीक कई साल पुरानी शर्ट पहन रहा है। जब भी सोनी कहती है...