वीर खान : लघुकथा

 

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-शमीमा हुसैन

 

वह एक वीर पुरुष है।

उसका नाम है चमक ख़ान।

नाम जैसा ही उसका कर्म भी है—जहाँ वह जाता है, जहाँ वह काम करता है, वहाँ उसका काम सचमुच चमक उठता है।

चमक ख़ान अपने काम को केवल ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि इबादत समझता है।

वह काम को लेकर अत्यंत गंभीर है। जो भी कार्य उसके हाथ में आता है, वह उसे पूरे मन, ईमानदारी और लगन से करता है।

आज के इस स्वार्थी ज़माने में, जहाँ लोग काम से ज़्यादा फ़ायदे को महत्व देते हैं, वहाँ चमक ख़ान जैसे ईमानदार लोग बहुत कम मिलते हैं।

उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी थी—उनकी माँ।

माँ के संस्कार, माँ की नसीहतें और माँ की दुआएँ ही उसकी असली ताक़त हैं।

माँ के इस दुनिया से चले जाने के बाद, उसकी कही हर बात और भी कीमती लगने लगी।

चमक ख़ान अक्सर सोचता है कि जो कुछ भी उसने पाया है—नाम, शोहरत, इज़्ज़त और धन—सब माँ की दुआओं का असर है।

उसने जो सपना देखा, उससे कहीं ज़्यादा उसे मिला।

उसके जीवन में सफलता की मानो बरसात हो गई।

लेकिन कहते हैं न, ज़िंदगी सिर्फ़ खुशियों का नाम नहीं होती।

अब आप कहेंगे—

“फिर हुआ क्या?”

तो सुनिए—

जिस घर के लिए चमक ख़ान ने अपनी ज़िंदगी लगा दी,

जिन लोगों को उसने अपने दिल से ज़्यादा चाहा,

वही उसके अपने—उसके भाई-बहन—उसे गद्दार और बेवफ़ा कहने लगे।

चमक ख़ान ने अपने घर के लिए हर फ़र्ज़ निभाया।

जो ज़िम्मेदारी उस पर थी, उसने पूरी ईमानदारी से अदा की।

अपना सुख त्यागकर उसने परिवार के लिए सब कुछ किया।

घर से उसे बेइंतहा प्यार था।

फिर भी—

बिना किसी कसूर के—

उसे गद्दार कहा गया।

उस पर झूठे इल्ज़ाम लगाए गए।

कड़वे शब्द बोले गए, गालियाँ दी गईं।

अपने ही खून से ऐसे शब्द सुनना किसी भी इंसान को तोड़ देता है।

चमक ख़ान मज़बूत था, पर पत्थर नहीं।

उन बातों ने उसके दिल को गहराई तक ज़ख़्मी कर दिया।

अक्सर वह अकेले में बैठ जाता है।

उसकी आँखें भर आती हैं।

वह चुपचाप अपनी आँखों से बहते आँसुओं को रुमाल से पोंछ लेता है—

ताकि दुनिया उसकी कमज़ोरी न देख सके।

उसके दिल में आज भी वही सवाल गूंजता है—

“अगर अपनों के लिए सब कुछ करना भी गुनाह है,

तो फिर वफ़ादारी किसे कहते हैं?”

फिर भी चमक ख़ान टूटता नहीं।

क्योंकि उसे याद है—

उसकी माँ ने उसे सिखाया था—

“बेटा, सच के रास्ते पर चलना मुश्किल ज़रूर होता है,

लेकिन अंत में वही रास्ता सबसे रौशन होता है।”

और यही विश्वास उसे हर दिन फिर से खड़ा कर देता है।








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