इमानदार :लघुकथा
-शमीमा हुसैन
रोमन एक कारपेंटर हैं। उसके अब्बा भी यही काम करते थे। अब्बा ने बेटे को कभी प्यार से, कभी सख़्ती से यह हुनर सिखाया था। उस कच्ची उम्र में अब्बा की बातें उसे बकवास लगती थीं, लेकिन आज उसे महसूस होता है कि अब्बा की हर बात अनमोल थी। इसी हुनर के बल पर रोमन आज अपना परिवार पाल रहा है।
रोमन के तीन लड़कियाँ और एक लड़का है। उसकी कमाई से घर तो चल जाता है, लेकिन पैसा बचता नहीं है। रोमन के पास कोई सेविंग नहीं है।
रोमन एक बहुत अच्छा कारपेंटर है। उसकी कला देखकर मन खुश हो जाता है। उसकी कारीगरी की चर्चा पूरे शहर में होती है। वह अपने काम में निपुण है। अब्बा ने उसे एक बात सिखाई थी—“बेटा, ईमानदार रहना, इसी में चैन-सुकून है।”
आजकल के ज़माने में सच्चाई को बेकार की चीज़ समझा जाता है, लेकिन रोमन इस नसीहत को गले में पट्टी की तरह बाँधे हुए है।
पिछले साल की बात है। शहर के एक सेठ ने उसे काम पर बुलाया और कहा कि हमारे घर का सारा फर्नीचर बना दो, जितना खर्च होगा बता देना। रोमन ने हिसाब लगाया और कहा—तीन लाख रुपये खर्च होंगे। सेठ ने उसे काम दे दिया और रोमन काम करने लगा।
एक दिन दोस्तों के साथ बैठकर उसने कहा, “सेठ के घर पर काम मिला है।”
दोस्त ने पूछा, “पैसा कितना मिला?”
रोमन ने कहा, “तीन लाख।”
दोस्त ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “पाँच लाख के काम को तुम तीन लाख में कर दिया, रेट खराब कर दिया।”
इस तरह बात खत्म हो गई।
इधर कुछ दिनों से रोमन के बेटे की तबीयत खराब रहने लगी। पास के डॉक्टर को दिखाया, लेकिन ठीक नहीं हुआ। फैमिली डॉक्टर ने कहा, “शहर के बड़े डॉक्टर को दिखाओ।”
रोमन बेटे को शहर के डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने बताया कि पेट की गंभीर बीमारी है और इलाज में चार लाख रुपये खर्च होंगे।
खर्च सुनकर रोमन का मन अंदर-ही-अंदर रोने लगा। उसके पास इतना पैसा नहीं था। उसने सोचा किसी से कर्ज लिया जाए। तभी उसे सेठ याद आया, जिनके यहाँ उसने ईमानदारी से काम किया था। वह सेठ के पास मदद माँगने गया।
सेठ ने पूरी बात ध्यान से सुनी और कहा, “थोड़ा रुको, मैं अपने बेटे को फोन करता हूँ।”
फोन पर बात करने के बाद सेठ ने कहा, “एक पैसा भी नहीं लगेगा। आपके बेटे का इलाज मेरे ही अस्पताल में होगा।”
फिर सेठ ने कहा,
“आप जैसे ईमानदार कारपेंटर की मदद करके मैं अपनी आख़िरत सुधार रहा हूँ।”

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