भूख : लघुकथा
AI Image -शमीमा हुसैन वह बहुत तेजी से चाकू चला रहा था। हठा-कट्ठा, छोटे कद का युवक था। रंग उसका गोरा था। उसके हाथ-पैर पर पड़ा खून साफ-साफ दिख रहा था, उसके गाल पर भी छींटे पड़े थे। इस खून के छींटों से उसे कोई तकलीफ़ नहीं थी। वह मुस्करा भी रहा था, हँस भी रहा था। हम जो दस-बारह लोग उसका मुँह ताक रहे थे, ऐसा लग रहा था कि उसे और भी मज़ा आ रहा है। मेरे आगे नाइटी में एक महिला खड़ी थी। बालों का जूड़ा रात वाला ही था, आधे बाल बिखरे हुए थे। हाथ नचाते हुए बोली, “ऐ रेहान, जल्दी कर, लाइन बढ़ती जा रही है।” “अब कितना जल्दी, मौसी?” मैं पीछे खड़ी थी, देखे जा रही थी कि इस पूरे आदमी का काम कितना हार्ड है। सुबह आठ बजे से ही मुर्गी ज़िबह करना, साफ करना, होटल के लिए काट-कूट करना, वजन करना और होटल में भेजना—सब शुरू हो जाता है। दस बजे ग्राहक आना शुरू हो जाते हैं। दस बजे से ग्राहकों को संभालना पड़ता है। पूरे दिन भर यही काम चलता रहता है। दोपहर दो बजे दो घंटे की छुट्टी होती है, फिर चार बजे से काम चालू हो जाता है। रात के बारह बज जाते हैं सफाई करते-करते। दिन भर हाथ में पानी लगा रहता है, दोनों पैरों में भी पानी ल...