माँ : लघुकथा
AI Image शमीमा हुसैन घर में आज फिर कुछ भी राशन नहीं था। कल हमीदा की नानी ने थोड़ा-सा चावल दिया था, उसी का गोलथी बना कर बच्चों को खिलाया और खुद भी खा लिया। [गोलथी- चावल की पतला घोल ] भारी मुसीबत के बीच झाड़ू लगाते हुए उसके आँसू ज़मीन पर गिरते जा रहे थे। तभी उसकी सास जेतुन भीतर आई। वह बोली, “रूहान की माय, सुन! चावल ले, दाल ले, और ये दस रुपया भी रख ले। आलू भी मंगा ले। आज बच्चों को दाल-भात और आलू की भुजिया बनाकर खिला दे। आठ दिन से बेचारे सिर्फ घोलथी खा रहे हैं।” बहू की आवाज़ काँप रही थी, “अम्मा… तेल नहीं है।” जेतुन कुछ पल रुकी, फिर बोली, “अच्छा, समीना को भेज मेरे साथ। दुकान से उधारी में तेल खरीद लूंगी। ये लहसुन के खेत में कमैनी का काम कर के लाई गई मजूरी है — चल, दाल-चावल तो हो जाए।” वह समीना को लेकर दुकान चली गई। मेरी नज़रों में जेतुन एक आयरन लेडी है — जो बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी न टूटती है, न रोती है, बस हिम्मत से खड़ी रहती है। यह तीसरी बार है जब उसका बड़ा बेटा पागल हो गया है। जेतुन बनिहारी करके अपना और छोटे बेटे का पेट पालती है। बड़ा बेटा शादीशुदा है और अलग रहता है। पहले भी दो बार बेटा...