लघुकथा : आशा और निराशा


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-नायला अदा


इस शहर की सुबह आज कुछ अलग ही थी। हर गलियों में हलचल थी, दीवारों पर लगे पोस्टर हवा में फड़फड़ा रहे थे और मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही थीं। लेकिन सबसे ज्यादा चमक एक लड़की की आँखों में थी, क्योंकि आज वह पहली बार वोट देने जा रही थी।

उसने कई दिनों तक हर उम्मीदवार और पार्टी के बारे में पढ़ा था। वह ऐसे लोगों को चुनना चाहती थी जो धर्म, जाति और नफरत की बातें न करें, बल्कि लोगों को जोड़ें। उसके मन में एक ही सपना था- ऐसा समाज जहाँ लड़कियाँ बिना डर के पढ़ सकें, आगे बढ़ सकें और अपने फैसले खुद ले सकें।

सुबह जल्दी उठकर उसने बड़े उत्साह से अपनी उंगली पर स्याही लगवाई और वोट डाल दिया। मतदान केंद्र से बाहर निकलते समय उसके चेहरे पर गर्व था। उसे लगा, जैसे उसने देश के भविष्य में अपना छोटा-सा योगदान दे दिया हो।

पूरा दिन वह टीवी और मोबाइल पर खबरें देखती रही। एग्ज़िट पोल देखकर उसके मन में उम्मीद और बढ़ गई। उसे पूरा विश्वास था कि वही पार्टी जीतेगी, जिसे उसने चुना था।

लेकिन नतीजे आने शुरू हुए तो उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। जिन लोगों और विचारों के खिलाफ वह थी, वही आगे निकलते जा रहे थे। शाम तक तस्वीर साफ हो चुकी थी। कोई दूसरी पार्टी भारी बहुमत से जीत गई थी।

उसने टीवी बंद कर दिया। कमरे में अजीब-सी खामोशी भर गई। उसकी आँखें नम हो गईं। उसे लगा, जैसे उसकी उम्मीद हार गई हो।

कुछ देर बाद वह बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। नीचे सड़क पर लोग जीत का जश्न मना रहे थे। ढोल बज रहे थे, पटाखे फूट रहे थे। वह चुपचाप उन्हें देखती रही।

तभी उसकी नजर अपनी स्याही लगी उंगली पर पड़ी।

वह धीरे से मुस्कुराई। उसे एहसास हुआ कि लोकतंत्र सिर्फ जीत का नाम नहीं है। अपनी सोच के साथ खड़े रहने का साहस भी उतना ही जरूरी है। आज उसकी पसंद हार गई थी, लेकिन उसका विश्वास नहीं।

उसने मन ही मन तय किया कि अगली बार भी वह वोट देगी, फिर उसी उम्मीद के साथ कि एक दिन समाज सचमुच बराबरी, न्याय और एकता की राह पर चलेगा।

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