दुकान : लघुकथा
AI Image शमीमा हुसैन आज नईम का मन बिल्कुल अशांत था। पूरे दिन दुकान में बैठे-बैठे न जाने कितने ग्राहकों से उसकी नोकझोंक हो गई। एक ग्राहक को उसने सामान का दाम पाँच गुना बता दिया। पर ग्राहक चालाक था, उसे असली भाव पता था। उसने तमतमाते हुए कहा, “मैं दूसरे दुकान से पूछकर आया हूँ। पाँच सौ की चीज़ तेरह सौ में बता रहे हो, इतना गला क्यों काट रहे हो? मुनासिब दाम में बेचो, नहीं तो बड़ा पाप होगा।” यह सुनकर नईम का गुस्सा और भड़क उठा। वह बहस करने लगा, “अमीर लोग कितना बड़े-बड़े गुनाह करते घूमते हैं, पर किसी को उनका गुनाह नहीं दिखता! हम गरीब रोज़ी कमाएँ, तो वही पाप नज़र आता है!” ग्राहक ने बात बढ़ते देख झट से जान छुड़ा ली। “मेरे पास लड़ने का समय नहीं है,” कहकर वह जल्दी से निकल गया। और नईम का दिन इसी ऊहापोह में कटता रहा — हर आने-जाने वाले ग्राहक को उलझाने, भड़काने का मन होता रहा। गुस्सा इतना चढ़ा था कि आज ही आज मालिक के मुँह पर नौकरी छोड़कर निकल जाए। मगर पेट का सवाल था। काम छोड़ा तो कल से रोटी का इंतज़ाम कौन करेगा? नईम ने जैसे खून का घूँट पीकर खुद को रोक लिया। महीने के तीस दिनों में सिर्फ़ एक दिन छ...