ईदी : लघुकथा
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-शमीमा हुसैन
आज ईद का दिन है। चारों तरफ खुशियों का मंजर है, लेकिन सफूर और रफ़ीक दोनों भाई आज दूर-दूर हैं।
एक महीने के रोज़ों के बाद यह दिन आया है। हर कोई खुश है। एक महीने की मेहनत और संयम का फल है आज का दिन। रोज़ा, नमाज़, सहरी, इफ्तारी और तरावीह जैसी इबादतों के बाद आज ईद आई है। हर कोई खुश है, क्योंकि ऐसी खुशी पूरे साल में शायद ही कभी देखने को मिलती है। ईद मनाने की इतनी उत्सुकता होती है कि रमजान के दौरान रोज़ बाज़ार सजते हैं। लोग नए कपड़े और खरीदने के लिए बाज़ार जाते हैं। महीने भर रोज़ा और इबादत करके लोग नेकी का खज़ाना जमा करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह नेकी और बरकत का महीना होता है। कम खाने और ज्यादा इबादत करने से दिल भी नर्म हो जाता है।
सफूर और रफ़ीक दोनों भाई का एक ही आंगन था। दोनों भाइयों के बच्चे साथ खेलते, साथ खाते और कभी-कभी साथ झगड़ भी लेते थे। इसी तरह दिन बीत रहे थे और बच्चे बड़े हो रहे थे।
लेकिन एक दिन बच्चों के झगड़े ने उस एक आंगन को दो आंगन बना दिया। सहीद और जमाल के बीच जोरदार लड़ाई हो गई। जमाल का माथा फूट गया और खून बहने लगा। जमाल सफूर का इकलौता बेटा था। वह थोड़ा शरारती था, लेकिन जब उसकी माँ ने बेटे का खून देखा तो वह सब भूलकर गुस्से में आ गई। गाली-गलौज और झगड़ा इतना बढ़ गया कि रिश्तों की डोर लगभग टूट गई।
रोज-रोज के झगड़ों से परेशान होकर रफ़ीक की बीवी ने कहा, “यहाँ से घर उठाकर कहीं और चलना ही बेहतर है।”
आखिरकार उन्होंने अपना घर बनाकर अलग जगह रहने का फैसला कर लिया।
यह पहली ईद थी जब दोनों घर अलग हो चुके थे। रफीक सोच रहा था कि शायद सफुर उससे मिलने आएगा। ईदगाह से लौटने के बाद उसने अपनी बेटी इमा को एक प्याला लेकर चाचा के घर भेजा।
लेकिन इमा रोती हुई वापस आ गई। चाची ने प्याला वापस कर दिया और कहा,
“हम तुम्हारे यहाँ का प्याला नहीं लेंगे।”
रफ़ीक को बहुत दुख हुआ। उसने सोचा कि आज ईद के दिन भी दिलों में इतना गुस्सा और दूरी क्यों है।
शाम के करीब चार बजे तक सोचने के बाद रफ़ीक खुद सफूर के घर चला गया। उसने भाई को गले लगा लिया और प्याला पिया।
उस दिन दोनों भाइयों को सबसे बड़ी ईदी मिली-एकता और भाईचारे की ईदी।

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