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दाई : लघुकथा

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AI Image    शमीमा हुसैन     अम्मा,  भादो आ गया है। “अम्मा, अम्मा, जुमेरात चला गया।” पुरानी टोला में सब इस जुमेरात को नियाज़ दिलाएँगे। “अम्मा, आप कब नियाज़ देंगी?” अम्मा खटिया पर लेटी है। कभी-कभी आँख खोलती है, फिर बंद कर लेती है। बच्चों की बातों में ज़रा भी रुचि नहीं है। उनके ज़ेहन में एक ही बात चल रही है—डाकिया कब आएगा। पिछले महीने तो सात तारीख को आया था। सुधि दुकानवाले का भी बहुत पैसा हो गया है। इस बार डाकबाबू बहुत देर लगा दिया है। अम्मा खटिया से उठकर आँगन में बर्तन माँजने लगती है। अनीस बाहर खेल रहा था। बच्चे फिर बेरा-बीबी, नियाज़ की बात करने लगे—कहाँ से फूल लाना है, कहाँ से थम्ब। कितना सुंदर, कितना बड़ा बेरा बनाना है—अनीस यह सब सुन रहा था। उसका रोने-रोने को हो गया। दौड़ता हुआ घर आया, अम्मा के पास आकर रोने लगा। अम्मा की चुप्पी टूटी। अनीस ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था— “अम्मा, हम सब बेरा-बीबी कब बनाएँगे?” अम्मा गुस्से में लाल होकर बोली— “पैसा आने दे, तब नियाज़ दिलाएँगे।” अनीस को बेरा-बीबी का पर्व बहुत अच्छा लगता था। इस पर्व में हल्ला-चिल्ला नहीं होता, शांति से पर्...