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गांव की लड़की : लघुकथा

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-नायला अदा हरियाली से भरा वह गांव खेतों और कच्ची पगडंडियों के लिए मशहूर था। गांव के किनारे बहती छोटी नदी के पास रोज शाम को बच्चों की चहल-पहल रहती थी। उसी गांव में पंद्रह साल की रमा रहती थी। सांवला चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें और तेज दिमाग- रमा पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ती थी और उसका सपना था कि वह बड़ी होकर अध्यापिका बने। रमा का परिवार गरीब था। पिता खेतिहर मजदूर थे और मां घर के साथ-साथ दूसरों के खेतों में काम करती थी। स्कूल से लौटने के बाद रमा अपनी सहेलियों के साथ गांव के बाहर बकरियां चराने जाती थी। यह उसका रोज का काम था। बकरियों को खुले मैदान में छोड़कर वे लड़कियां कभी पेड़ों के नीचे बैठकर बातें करतीं, कभी स्कूल का होमवर्क पूरा करतीं। रमा बाकी लड़कियों से अलग थी। वह खेल-कूद और हंसी-मजाक के बीच भी अपनी किताबें साथ ले जाती। उसकी सहेलियां अक्सर कहतीं, “अरे रमा, तू हर समय पढ़ाई ही करती रहती है।” रमा मुस्कुरा कर जवाब देती, “पढ़-लिख लेंगे तो जिंदगी बदल जाएगी।” एक दिन जब वे सब बकरियां चरा रही थीं, तभी गांव का एक युवक वहां आ पहुंचा। उसका नाम मोहन था। उम्र लगभग पच्च...