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...तो क्या गोडसे ने इसलिए की थी गांधी की हत्या?

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-गुलज़ार हुसैन जातिवाद की समस्या को लेकर बाबासाहेब आंबेडकर का महात्मा गांधी से जो संवाद था वह बेहद जरूरी और तार्किक था। तमाम असहमतियों के बावजूद यह डिस्कशन ऐसा था, जो निरंतर था।  दरअसल, गांधी छुआछूत और जातिप्रथा की कुरीतियों के खिलाफ जोरदार आंदोलन चला रहे थे, लेकिन आंबेडकर का जातिवाद के खिलाफ आंदोलन वैज्ञानिक दृष्टिकोण लिए हुए था। आंबेडकर तो जातिभेद का समूल रूप स े खात्मा चाहते थे, लेकिन गांधी का तरीका कुछ और था। गांधी भी जात-पांत और छुआछूत के पूरी तरह खिलाफ थे, लेकिन वे ह्रदय परिवर्तन की बात कहते थे। गांधी जातिवाद को फालतू अंग मानते थे। उन्होंने ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा था, ‘जातपांत के बारे में मैंने बहुत बार कहा है कि आज के अर्थ में मैं जात-पांत को नहीं मानता। यह समाज का 'फालतू अंग' है और तरक्‍की के रास्‍ते में रुकावट जैसा है।’ हालांकि वर्ण व्यवस्था पर उनका तर्क बहुत फिलॉस्फिकल था और इसको लेकर उनकी आलोचना भी होती थी, लेकिन इसके बावजूद वे वर्णवाद को व्यर्थ समझते हुए इससे दूर जा रहे थे। वे वर्णवाद की एकदम अलग व्याख्या करते हुए अंतत: इसे महत्वहीन मानते थे। हमें यह मा...

कहानी: डिटेंशन कैंप सेवा

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Photo by  Shail Sharma  on  Unsplash कहानी: गुलजार हुसैन  (S hort story by Gulzar Hussin ) लोगों ने उसके गले में देखा कि एक पट्टी लटक रही है। उस पर बहिष्कृत नंबर119 लिखा है। साथ ही और कई तरह के संदेश उस पट्टी में छोटे- छोटे अक्षरों में लिखे थे। लोग जब आश्वस्‍त हो गए कि वह बहिष्‍कृत है, तो सब ठठाकर उसपर हंसने लगे। भीड़ में से एक व्‍यक्ति ने उसकी तरफ थूक भी दिया।  वह उतरने के समय ट्रेन से गिर गया था। लोगों ने समझा था कि वह उतरते समय ट्रेन से प्‍लेटफार्म पर इसलिए गिर गया था, क्‍योंकि वह गेट पर लटकने वाला लापरवाह आदमी था। लेकिन यह बात सही नहीं थी। ऐसा लगता था कि ट्रेन से उतरते समय पीछे से भीड़ का धक्‍का लगने से वह गिर गया होगा। लोगों ने यह तो साफ- साफ देखा ही था कि चढ़ने वालों की भीड़ से उसके हाथ और पैर कुचल गए थे। उस भीड़ में से किसी ने उसे उठाया नहीं था। दरअसल कोई उसे उठा भी नहीं सकता था। लोकल ट्रेन पल भर में खुल जाती है, इसलिए पीक आवर में चढ़ने- उतरने वाली भीड़ की बड़ी तेज गति होती है। इस तेज गति में कोई अनजान आदमी खुद को संभाल नहीं सकता। अगर उ...

मैं भी 'काफ्काएस्क'

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  Franz Kafka By Gulzar Hussain कभी-कभी सोचता हूं कि आखिर क्‍यों काफ्का ( Franz Kafka,  3 July 1883 – 3 June 1924)  ने अपने दोस्‍त मैक्स ब्रोड को अपनी सारी पांडुलिपियां देकर आग के हवाले कर देने को कहा होगा? ...आखिर क्‍यों उसके अंदर इतनी निराशा भर गई होगी? क्यों उसे लगा होगा कि उसका लिखा सब कुछ व्‍यर्थ है? हिटलर काल की प्रारंभिक यातनाओं- युद्ध के खतरों को नजदीक से देखने वाले एक भावुक कथाकार के अंदर कौन सी परिस्थितियां कील की तरह चुभ रही हैं, वह हर कोई जान भी तो नहीं सकता था। क्‍या काफ्का का दोस्‍त मैक्स ब्रोड और काफ्का की प्रेमिका डोरा भी उसे ठीक से समझ पाई होगी? ..जिस डोरा की बांहों में काफ्का ने दम तोड़ा था, क्‍या उसने काफ्का की आंखों में झांकते वक्‍त उसकी बेचैनी को समझा होगा?... खैर, डोरा से ही सवाल क्‍यों हो, वह तो उसे महज 11 महीने पहले ही उससे मिली थी... आजीवन बुखार में थरथराते रहे काफ्का को समझना आसान नहीं था, यह उसकी कहानियों से साफ हो जाता है, फिर भी वह जिस पीड़ा को सीने में जब्‍त कर कलम चला रहा था, उसे देखना जटिल ह...

जो दोस्त की तरह जिंदगी में शामिल हो गए

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Shaheed Bhagat Singh का दुर्लभ चित्र By Gulzar Hussain बड़ी सीधी बात है कि जो बचपन में दोस्त की तरह आपसे घुलमिल जाए, उसे दिल से एक पल के लिए भी भुलाना आसान नहीं है। हां मैं भगत सिंह की ही बात कर रहा हूं। दरअसल, यह जीवन का वह दौर था, जब भगत सिंह के साथ ही बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा गांधी के विचार मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ रहे थे। ...लेकिन भगत सिंह मेरे बचपन को वैचारिक रूप से झकझोरने वाले पहले नायक थे। स्कूल के दिनों में ही भगत सिंह एक विराट ह्रदय वाले नायक की तरह मेरे दिल ओ दिमाग पर छा गए थे। उनकी छवि मेरे अंदर ऐसे ही नहीं निखरी थी ...तब मुझे बाल पत्रिकाओं का नशा चढ़ा रहता था, इसलिए उनकी कुछ छवि बाल पत्रिकाओं में उनके बारे में कभी-कभार छपे लेखों से बनी थी, तो कुछ मेरे बड़े भाई साहब की लाई पुस्तकों और चर्चाओं से आकार ले रही थी। ...हां इसके अलावा एक मनोज कुमार अभिनीत फिल्म ‘शहीद’ भी थी, जो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर आती रहती थी ... इन सबसे जो भगत सिंह बना था बचपन में मेरे अंदर वह फिल्मों के उदात्त नायकों पर भारी पड़ता जा रहा था ...टीवी पर आने वाली अमिताभ की पुरानी फिल्मों का ...

मुंबई की सलामती के लिए आरे जंगल को बचाइए

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                   Calligraphy poster:     Dhananjay Kokate आरे के हजारों हरे-भरे पेड़ों और पंछियों को उजाड़ने का सीधा प्रभाव मुंबई में रहने वालों पर पड़ेेेेगा। नतीजा यह होगा कि मुंबई किसी सुनामी जैसी आपदा में डूब सकती है या रेगिस्‍तान की तरह सूख सकती है। पूरी मुंबई एक सुर से आरे बचाने के पक्ष में खड़ी है, लेकिन इस आवाज से जंगल उजाड़ने वालों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।  By  Gulzar Hussain कुछ लोग आरे जंगल को मुंबई का दिल कहते हैं, तो कुछ लोग इसे मुंबई का फेफड़ा (लंग) कहते हैं। चाहे कुछ भी कहिए आप इस छोटे से जंगल को, लेकिन पथरीले महलों से भरे इस मुंबई महानगर की सांसें यदि चल रही हैं, तो केवल आरे जंगल के कारण चल रही हैं। लेकिन अब इस जंगल को उजाड़ने की पूरी तैयारी कर ली गई है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि महाराष्ट्र सरकार के यहां मेट्रो कार शेड बनाने के निर्णय से जंगल के साथ यहां के पशु-पक्षियों और यहां रहने वाले वार्ली समुदाय के लोगों का अस्तित्‍व भी खतरे में पड़ सकता है। मुंबई में आरे ...

बारुदगंध पसरण्यापूर्वी : हिन्दी से अनूदित कविता

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Photo by  Girish Dalvi  on  Unsplash  पहली बार मेरी किसी कविता का अन्य भारतीय भाषा में अनुवाद हुआ है, इसलिए इसे अपने ब्लॉग पर रखने की इच्छा को रोक नहीं सका। मेरी कविता ‘बारूद की गंध फैलने से पहले’ का अनुवाद लेखक और अनुवादक भरत यादव ने इतनी खूबसूरती से किया है कि यह मराठी भाषा में ही लिखी गई कविता लगती है। उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद।                                                                                                                                                            बारुदगंध पसरण्यापूर्वी / (बारूद की गंध फैलने से पहले)           ...

रविदास मंदिर का हो पुनर्निर्माण, भाजपा के मौन पर उठे सवाल

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दिल्‍ली का रामलीला मैदान / तस्‍वीर:दिलीप मंडल के FB पोस्‍ट से साभार  शहरी विकास मंत्रालय के अधीन आने वाले डीडीए ने की थी तोडू कार्रवाई   सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा पिछले दिनों दिल्ली  के तुग़लकाबाद में गुरु रविदास मंदिर ( Ravidas temple)  के ढहाए जाने का जोरदार विरोध शुरू हो गया है।  दिल्‍ली  (Delhi) में मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग को लेकर बड़ी संख्‍या में लोग सड़कों पर उतर गए। लोग भाजपा सरकार के मौन पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जिस डीडीए ने संत रविदास के मंदिर को तोड़ा है, वह भाजपा सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के अधीन आता है, तो फिर भाजपा सरकार ने मंदिर को बचाने के बदले उसे तोड़ने में अपनी ताकत क्‍यों लगा दी?   वरिष्‍ठ पत्रकार दिलीप मंडल ( Dilip C Mandal  ) ने फेसबुक पर लिखा है- 'दिल्ली के जिस रविदास गुरुघर या मंदिर के लिए इब्राहिम लोदी ने ज़मीन दी। पूरे लोदी वंश और मुग़ल वंश के समय जो मंदिर सुरक्षित रहा। जिस मंदिर को अंग्रेज़ों ने भी नहीं छेड़ा, विभिन्न पार्टियों की...