Posts

कोहरे में धूप

Image
कहानी : गुलज़ार हुसैन  घोड़ी ने बड़े आराम से पीछे का एक पांव उठाकर अजीज के हाथ में दे रखा था और वह हथौड़ी से धीरे - धीरे नाल ठोक रहा था ... ठक ... ठक ... ठक ... जब कभी हथौड़ी जोर से पड़ जाती , तो घोड़ी पूंछ हिलाती हुई जोर से हिनहिना उठती। अचानक घोड़ी ने जोर से अपना पांव हिला दिया तो अजीज अपने बुढाए शरीर को संभाल नहीं सका और हड़बड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा। खजूर के पेड़ के नीचे बैठी बुढ़िया अलाव के लिए शीशम और बबूल की सूखी लकड़ियों के ढेर लगा रही थी। उसने देखा तो चीखती हुई दौड़ी। ‘‘ या अल्लाह , ये क्या हुआ ? ’’ हाथ पकड़ कर उसे उठाते हुए बुढ़िया ने कहा।   ‘‘ कुछ नहीं ... हरामजादी बिदक गई। एक तो इस हफ्ते कोई लंबी सवारी नहीं मिली और ऊपर से इसके नखरे ... उफ्फ ’’ कमर पकड़ कर अजीज ने लंबी सांस खींची , तो उसकी   सफेद दाढ़ी पतंग की तरह कांप गई। बुढ़िया दौड़ कर अंदर से सरसों का तेल ले आई और कोठरी से खटिया बाहर खींच लिया। अजीज चादर उतार कर उस पर पेट के बल लेट गया। बुढ़िया ने उसकी लूंगी थोड़ी नीचे खिसका दी और कमर में तेल मलने लगी। उसका झुर्रीदार चेहरा चिंता से और अधिक सिकुड़ा - सिकुड़ा नजर आने ...

उदारवादी छवि और आतंक के शोर में गुम मेहनतकश किरदार

Image
- गुलज़ा र हुसैन पिछले दिनों दंगे में अपने युवा बेटे को खोने वाले इमाम रशीदी ने जब हर हाल में भाईचारा बनाए रखने की अपील की, तो बरबस 'शोले' फिल्म के इमाम रहीम चाचा की याद आ गई। इस फिल्म में इमाम साहब का युवा बेटा अहमद जब डाकू गब्बर सिंह के हाथों मारा जाता है, तो वे कहते हैं कि पूछूंगा खुदा से कि मुझे और बेटे क्यों नहीं दिए गांव पर शहीद होने के लिए। दरअसल वर्ष  1975  में आई रमेश सिप्पी की फिल्म 'शोले' का यह संवाद हिंदी फिल्मों में मुस्लिम चेहरे का सबसे लोकप्रिय संवाद माना जा सकता है। हिंदी फिल्मों में मुस्लिम चरित्र की मौजूदगी को समझने के लिए 'शोले' के संवाद 'और बेटे क्यों नहीं दिए गांव पर शहीद होने के लिए' और फिल्म 'माय नेम इज खान' के संवाद 'माय नेम इज खान एंड आई एम नॉट ए टेररिस्ट' तक के विस्तार को देखने की जरूरत है। लोकप्रिय फिल्म शोले का एक दृश्य  'शोले' के इमाम साहब की उदारवादी छवि से निकलकर मुस्लिम पात्र को 'मैं आतंकी नहीं' कहने की अपील करने की स्थिति तक पहुंचने के लिए कितने वर्ष लगे यह देखना महत्वपू...

खातिया और हरी-भरी पगडंडियां

Image
BY GULZAR HUSSAIN खातिया एक दृष्टिहीन लड़की है, लेकिन उसके सपने उस गांव की हरियाली से अधिक चमकीले हैं। मासूम मुस्कान लिए खातिया अब भी नर्म घासों से भरी पगडंडियों पर दौड़ती हुई आती है और अचानक किसी बगीचे में गुम हो जाती है। हां उसका एक  प्रेमी भी था। कहा जाता है कि लोग अपना पहला प्यार नहीं भूल सकते हैं, तो बचपन में पढ़ा गया पहला उपन्यास और उसके पात्रों को कैसे भूल सकते हैं। मैं भी नहीं भूला। मुझे उस उपन्यास के गांव की हरी-भरी पगडंडी याद है ...उस गांव के मेहनती और बेहद आत्मीय लोग याद हैं ...उस गांव की अल्हड़ और हंसमुख लड़कियां याद हैं  ...बेलगार की पनचक्की याद है ...और संगमरमर से सफेद कपड़ों में रहने वाली सुंदर युवती खातिया की खिलखिलाहट याद है। उपन्यास में खातिया एक दृष्टिहीन लड़की है, लेकिन उसके सपने उस गांव की हरियाली से अधिक चमकीले हैं। मासूम मुस्कान लिए खातिया अब भी नर्म घासों से भरी पगडंडियों पर दौड़ती हुई आती है और अचानक किसी बगीचे में गुम हो जाती है। हां उसका एक  प्रेमी भी था। सोसोया। लेकिन मुझे उसका चेहरा ठीक से याद नहीं...उपन्यास की कहानी भी अब पूरी तरह याद नहीं है, ल...

अभिनय सीखने की ललक होनी चाहिए: ललित पारिमू

Image
           Bhupali Tamboli and Lalit Parimoo / Photo by Milind tambe  Interview:    Gulzar Hussain   ( साक्षात्कार: गुलज़ार हुसैन )  रं गमंच, टीवी और फिल्मों में अपने शानदार अभिनय से लोगों का दिल जीतने वाले ललित पारिमू ( Lalit Parimoo)  से पिछले दिनों बातचीत करने का अवसर मिला। उन्होंने अभिनय के अलावा कई विषयों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि अभिनय सीखने की चीज है। नई पीढ़ी को यदि अभिनय के क्षेत्र में जमना है, तो उसमें सीखने की ललक होनी चहिए। ललित साहित्य प्रेमी अभिनेता हैं। उन्होंने बताया कि साहित्य पढ़ने से उन्हें अभिनय की बारीकियों को समझने में बहुत मदद मिलती है। उन्हें अक्सर बुक स्टॉल पर अच्छी पुस्तकों और पत्रिकाओं की तलाश करते देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि उन्हें फणीश्वरनाथ रेणु के  उपन्यास ‘मैला आंचल’ पर बने धारावाहिक में काम करने का मौका मिला। वे इसकी शूटिंग के लिए बिहार के फारबिसगंज कई इलाकों में गए और बड़े लगन से काम किया।  थियेटर से शुरू हुआ सफर  ललित कश्मीर से हैं और उन्ह...

अश्वेतों पर जुल्म के खिलाफ उठा ली कलम

Image
आइए, आज आपको जुलिएट हैंपटन मोर्गन से मिलवाते हैं।  मोर्गन एक श्वेत अमेरिकी महिला थीं, लेकिन उन्होंने अश्वेतों के साथ होने वाले अन्याय और शोषण का जमकर विरोध किया। वे लाइब्रेरियन थी, लेकिन रंगभेद के खिलाफ उनके लिखे आलेखों ने लोगों को हिला कर रख दिया था। एक बार वे बस से घर लौट रही थीं, तभी उन्होंने पहली बार एक अश्वेत महिला पर अत्याचार होते हुए देखा। अश्वेत महिला बस में घुसी और टिकट लेकर फिर उतर कर पिछले  गेट से घुसने के लिए बढ़ गई।  ऐसा अक्सर अश्वेत लोगों के साथ वहां होता था, लेकिन इस बार जो मोर्गन ने देखा, तो उससे वह स्तब्ध रह गर्इं। जब तक अश्वेत महिला पिछले दरवाजे से बस घुसती, तब तक ड्राइवर ने बेरुखी से बस आगे बढ़ा दी। अश्वेत महिला बस के बाहर ही रह गईं। यह सब मोर्गन से बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने इमरजेंसी कोर्ड खींच कर बस रोक दी। इसके बाद उन्होंने ड्राइवर से बस का पिछला दरवाजा खोलकर महिला को अंदर आने देने के लिए कहा।   इस तरह मोर्गन जब भी कहीं अश्वेतों के साथ अत्याचार होते देखती, तो इसके खिलाफ क्रांतिकारी लेख लिखने बैठ जाती। स्थानीय अखबारों में छपे उनके लेखो...

तुम्हारे गुलमोहर पर अब कभी कोयल नहीं आती

Image
Photo by Abhijit Pattnaik on Unsplash -गुलज़ार हुसैन  घर में बंदूक रखने से कभी सोचा कि क्या बिगड़ा? तुम्हारे गुलमोहर पर अब कभी कोयल नहीं आती *** कलम उठाई है तो इस कलम का मान तुम रखना भले कट जाए गरदन, इंसाफ की जुबान तुम रखना *** आंखें हैं, दिल है और लब भी साथ है मेरे तो कैसे चुप रहें, इंसान पर जब जुल्म होता हो *** वे हमारी पीठ पर कोड़े चला के हार गए किसी को मार के कुछ भी नहीं जीता जाता *** वंचित जनों की पीठ पर चाबुक चलाते हो अरे कैसे फिर भारत माता की जय गाते हो *** तुम्हारे खेत, तुम्हारे बाग-बगीचे, तुम्हारे ही पोखर आओ, दलित-पसमांदा की नजरों से ये दुनिया देखो *** वतन के लिए जिसने अपनी जान तक दे दी उसके लिए तूने मसान का एक कोना नहीं दिया *** सफर अधूरा, प्यार अधूरा, हर मुलाकात अधूरी ही रही मगर वतन को और बेहतर बनाने का ख्वाब अधूरा न रहे *** फुटपाथ पर चलो तो कदम आहिस्ता से रखना सियाह रात में थक कर यहां मजदूर सोते हैं *** उसके होंठों पे थी मुस्कान और आंखों में दर्द था दिल ने कहा, गर प्यार है तो आंखों को चूम लो...