गिलास और प्लेट : लघुकथा



-शमीमा हुसैन

शेख साहब के घर में सब कुछ था। बहुत पैसा था, बहुत खाना था और बच्चों के लिए हर तरह की सुविधा थी। फिर भी घर के काम के लिए एक नौकरानी की जरूरत थी।
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शेख साहब की पत्नी कई दिनों से कह रही थीं—

“एक कामवाली रख लो। मुझे घर के काम में बहुत परेशानी होती है।”

आखिरकार उन्हें एक कामवाली मिल गई, जो सुबह-शाम आकर झाड़ू-पोंछा और बर्तन का काम करती थी।

एक दिन मैं किसी काम से उनके घर गई। उनके किचन में रखा गिलास उठाकर पानी पीने ही वाली थी कि उनकी छोटी लड़की बोली—

“आंटी, आंटी! इस गिलास में पानी मत पीना।”

मैंने पूछा—

“क्यों?”

छोटी लड़की ने बताया—

“इसमें कामवाली पानी पीती है।”

मैंने पूछा—

“उसके खाने के लिए भी अलग प्लेट रखी होगी?”

लड़की ने तुरंत कहा—

“हाँ, उसका प्लेट भी अलग है।”

मैं हैरान रह गई।

थोड़ी देर बाद बातचीत के दौरान मैंने उनकी माँ से पूछा—

“क्या आप अपनी कामवाली को खाना भी खिलाती हैं?”

उन्होंने कहा—

“खाना तो नहीं खिलाते। हाँ, कभी कुछ अच्छा बना हो तो दे देते हैं।”

मैंने पूछा—

“फिर उसके लिए प्लेट और गिलास अलग क्यों हैं?”

उन्होंने ऐसा जवाब दिया कि मैं कुछ देर के लिए चुप हो गईं।

उन्होंने कहा—

“शायद उसे कोई बीमारी हो, इसलिए उसका प्लेट और गिलास अलग रखते हैं।”

मैंने कहा—

“अगर किसी को बीमारी होती है तो वह रोज़ आपके घर आकर झाड़ू-पोंछा और बर्तन कैसे कर सकती है? वह स्वस्थ है, तभी तो आपके घर का काम करती है। असल बात बीमारी की नहीं, छुआछूत और उसे छोटा समझने की है। इसी वजह से उसके लिए प्लेट और गिलास अलग रखे गए हैं।”

मैंने यह बात हँसते-हँसते कह दी, लेकिन उनकी चेहरे की रंगत उड़ गई।

फिर उन्होंने भी हँसते हुए कहा—

“अरे, ऐसी बात नहीं है। कभी-कभी बीमारी होती है और पता नहीं चलता। इसलिए सावधानी के लिए ऐसा करते हैं।”

लेकिन मैं समझ गई थी कि बात बीमारी की नहीं, छुआछूत की थी।

गरीब होना किसी इंसान को छोटा नहीं बनाता।

अगर किसी गरीब को बची हुई रोटी फेंककर दी जाती है, तो मन में यह सवाल उठना चाहिए—

क्या उस रोटी को एक प्लेट में रखकर सम्मान से नहीं दिया जा सकता?

सिर्फ इसलिए कि कोई गरीब है, क्या उसके साथ ऐसा व्यवहार करना सही है?

आखिर कौन जानता है कि आज जो अमीर है, वह हमेशा अमीर ही रहेगा? और जो आज गरीब है, क्या वह हमेशा गरीब ही रहेगा?

अमीरी और गरीबी बहुत चंचल होती हैं। परिस्थितियाँ कब बदल जाएँ, कोई नहीं जानता।

इसलिए किसी इंसान से सिर्फ इसलिए नफरत या भेदभाव क्यों किया जाए कि वह गरीब है या किसी तथाकथित छोटी जाति से है?

जब वही व्यक्ति अमीर हो जाता है, तो लोग उसके साथ बैठकर लंच और डिनर करने लगते हैं।

पैसा लोगों की नज़र में सबको बराबर कर देता है—लेकिन इंसानियत तो बिना पैसे के भी बराबरी सिखा सकती है।

होटल में हम सब एक ही तरह के बर्तन में खाना खाते हैं। हमें यह नहीं पता होता कि उसी प्लेट में हमसे पहले कोई गरीब, मजदूर या भिखारी खा चुका है या कोई बड़ा सरकारी अधिकारी।

तब हमें कोई आपत्ति नहीं होती।

तो फिर अपने ही घर में काम करने वाले इंसान के लिए अलग प्लेट और गिलास क्यों?

खाना तो सबको खाना पड़ता है।

फिर एक घर में काम करने वाले गरीब इंसान के साथ भेदभाव क्यों?

उस दिन के बाद से शेख साहब की बीवी मुझसे बहुत कम बात करने लगीं। पहले भी अक्सर मैं ही उन्हें सलाम करती थी, लेकिन अब तो कभी-कभी ऐसा लगता कि मुझे देखकर वह रास्ता तक बदल लेती हैं।

मैंने तो कोई गलत बात नहीं कही थी। मैंने सिर्फ वही कहा था जो मुझे सही लगा।

शायद उन्हें मेरी बात बुरी लगी।

लेकिन अब मैं क्या कर सकती हूँ?

मैं अपने घर में खुश हूँ और वह अपने घर में।

और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है—

इंसान की कीमत उसके पैसे, जाति या काम से तय होगी, या उसकी इंसानियत से?



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