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सौमित्र चटर्जी, जिनकी फिल्में बार-बार देखने का मन करता है

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अपूर संसार में उनका ऐसा दिल को छू लेने वाला अभिनय है कि कोई उसकी जगह पर कोई दूसरा अभिनेता का नाम लेने को कहे, तो मुझसे किसी का नाम न लिया जाए। यहां, उनकी आंखों में एक खालीपन है, वे अपनी पत्नी की तरफ अपलक निहारते हैं। उफ़्फ़। एक दृश्य में वे पूछते हैं- ‘..तोमार चोखे की आछे बोलो तो ?’ एक-एक संवाद को इतनी संजीदगी से कोई कैसे जी सकता है भला। यह तो एकदम जादुई अभिनय है। इसी फिल्म में बाद में अपने नन्हे बेटे के साथ उनका संवाद तो इतना भावुक बन पड़ा है कि पूछिए मत। इस समय मैं जब भी जरा ठहर कर यह सोचता हूं कि भारतीय फिल्मों का कौन सा ऐसा अभिनेता है, जिसका अभिनय मेरे दिल को छू लेता है ...जिसकी फिल्में अब भी शिद्दत से देखने का मन करता है, तो वह नाम है सौमित्र चटर्जी का। इस नाम के सामने मैं न जाने क्यों हिंदी और कुछेक हॉलीवुड फिल्मों के दिग्गज अभिनेताओं के नाम भूल-सा जाता हूं। मैं अपने बाबा को आज भी शुक्रिया कहना चाहता हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में टीवी पर सौमित्र चटर्जी की बेहतरीन फिल्में देखने की छूट दी। बाद में बड़े होने पर मैंने फिर से उनकी फिल्मों को कई बार देखा। सत्यजीत रे के निर्देशन में बनी क...

राहुल गांधी को मिल गया 'अलादीन का चिराग'?

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भारत जोड़ो यात्रा का एक दृश्य/ फोटो : सोशल मीडिया से साभार निस्संदेह भारत जोड़ो यात्रा ( #BharatJodoYatra ) से कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi )  की छवि बदली है। इसे राहुल के समर्थक ही नहीं दबी जुबान से राहुल गांधी के विरोधी भी मान रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस यात्रा से क्या राहुल गांधी कांग्रेस के दिन बदल पाएंगे। यह तो साफ है कि भारत जोड़ो यात्रा शुरू होने पर इसकी सफलता पर संदेह किया जा रहा था, लेकिन इस यात्रा को जितना समर्थन मिला, वह कांग्रेस पार्टी के लिए किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं है। कन्या कुमारी से चली यात्रा में गांवों-कस्बों के गरीब-गुरबे, स्त्रियां और मजदूर ही नहीं जुड़े, बल्कि फिल्म और समाजसेवा से जुड़े चर्चित चेहरे भी जुड़े और इसकी चर्चा भी खूब हुई। अभिनेता सुशांत सिंह से लेकर कमल हासन जैसे दिग्गज अभिनेता भी इसमें शामिल हुए। अभिनेता-अभिनेत्रियों के अलावा पूर्व आरबीआई अध्यक्ष रघुराम राजन के शामिल होने की चर्चा भी खूब रही। सत्ताधारी भाजपा इन चेहरों की आलोचना भी करती नजर आई, जिससे राजनीतिक विश्लेषकों को यह लगा कि यह एक तरह से यात्रा क...

लघुकथा : जवानी

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Photo by Briana Tozour on Unsplash कथाकार : शमीमा हुसैन ''ताहिरा ...ताहिरा, क्या कर रही हो? आज तो तुम्हारा छुट्टी का दिन था, घर पर थोड़ा आराम ही कर लेती।'' दूर से मां की आवाज आई। ताहिरा अनसुना करते हुए बाथरूम की तरफ चली जाती है। फिर वहां से आकर किचन में जाकर देखती है, उसका मनपसंद खाना खीर-पूरी बना हुआ है। इसके बाद वह सीधे मां के पास आकर कहती है, ''ममा, आज तो आपने मेरे पसंद का खाना बनाया है। ...शुक्रिया ममा। मैं तो आलिया आंटी के पास गई थी और उसके बाद सविता आजी के इधर चली गई, इससे लेट हो गया।'' ममा तुनक कर बोली, ''मुझे कुछ मत सुना, तेरे दिल में जो आए तू कर।'' ताहिरा जानती थी ममा को कैसे मनाना है। ममा लेटी हुई थी। वह सीधा उनके पैर के पास बैठ गई और उसके पैर दबाने लगी। ममा चाहे कितनी भी गुस्सा क्यों न हो, वह पैर दबाने से पिघल ही जाती है। थोड़ी देर में ही ममा बोल पड़ी, ''चल, खाना लगाती हूं। छोड़, पैर में दर्द नहीं है।'' ''ममा थोड़ा सा दबा देती हूं।'' ताहिरा पैर दबाते हुए बोलती है। ममा पैर को खींचकर उठ जाती है। ...

देवदास की आखिरी इच्छा

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    देवदास फिल्म का पोस्टर/ सोशल मीडिया से साभार By Gulzar Hussain उसकी आखिरी इच्छा क्या थी, यही न कि सांसों की डोर टूटने से पहले बस एक बार वह अपने बचपन की प्रेमिका को देख ले... लेकिन यह भी नहीं हो सका। पारो के दरवाजे पर आकर उसके नाम लेता हुआ देवदास दम तोड़ता रहा ...लेकिन पारो उससे मिलने की चाहत के बावजूद नहीं आ पाई ...वह देवदास से मिलने के लिए घर से दौड़ी लेकिन उसे घर के बंधन ने रोक लिया। दरवाजे बन्द कर दिए गए। क्या यही है किसी सच्चे प्रेम की मंजिल? शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित 1955 में बनी बिमल राय की इस फिल्म में दिलीप कुमार ने मानो देवदास के हर सजीले पल को जीवंत कर दिया है। ट्रेन से उतरने के बाद नशे में लड़खड़ाते देवदास के मन में बस एक ही आस है कि वह पारो से मिल ले। यह ठीक ऐसी ही आस या इच्छा है, जब कोई भी व्यक्ति मरने से पहले अपने सबसे प्रिय कार्य को पूरा कर लेना चाहता है। एक चित्रकार चाहता है कि मरने से पहले उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति पूरी हो जाए ...एक उपन्यासकार अपनी मौत से पहले कालजयी उपन्यास लिख लेना चाहता है ...एक पिता अपने बच्चों के सपने पूरे होते देखने के बाद ही मरना चाह...

वह भूखा था, प्यासा था, मगर चोर नहीं था...

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जागते रहो'फिल्म का एक दृश्य :  सोशल मीडिया से साभार By Gulzar Hussain आप भी सोचेंगे कि नेटफ्लिक्स पर चमकती-दमकती फिल्मों के दौर में मैं यह पुरानी ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्म के बारे में क्या कहने बैठ गया। लेकिन होती है कोई कसक ...कोई हूक जो किसी फिल्म को देखकर या याद कर अचानक उठती है और ऐसी उठती है कि चुप रहा नहीं जाता, लेकिन 1956 में बनी फिल्म जागते रहो के बारे में कुछ कहने से पहले मैं चलती ट्रेन की खिड़की पर लटके एक चोर के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। दरअसल, कुछ दिनों पहले एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ लोग ट्रेन की खिड़की पर एक चोर पंकज कुमार को पकड़े हुए दिखे और वह जान बचाने की गुहार लगाता दिखाई दिया। उस वीडियो पर सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया देखकर मैं दंग था। कोई लिख रहा था-हाथ क्यों न छोड़ दिया, मर जाता, कोई लिख रहा था-ठीक हाल किया, ऐसे लोगों की यही सजा है। दरअसल, यह सब वैसा ही मॉबलिंचिंग जैसा दृश्य था, जिसमें मोबाइल चोर, पॉकेटमार या झपटमार के आरोपी को पकड़कर भीड़ बेरहमी से पीटती है और वहां कोई भी बीच-बचाव करने नहीं आता। अगर चोर ने खिड़की से मोबाइल चोरी का प्रयास किया भी था, तो भी...

हिटलर के तानाशाह बनने की कहानी

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                 Photo by Mathew Browne on Unsplash  (प्रतीकात्मक फोटो) By Gulzar Hussain इस फिल्म (टीवी सीरीज) को देखकर मन में इतनी हलचल मची हुई है कि कुछ लिखे बिना रहा नहीं जा रहा... दरअसल, इस फिल्म को हर पत्रकार और लेखक को जरूर देखना चाहिए। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं, इसे यहां अंत में बताऊंगा। ...सबसे पहले तो मैं यह बता दूं कि 2003 में बनी इस कनाडियन सीरीज Hitler: The Rise of Evil की सबसे बड़ी खासियत है इसके मुख्य किरदार निभाने वाले रॉबर्ट कर्लेले (Robert Carlyle) का अभिनय। हिटलर के शैतान के रूप में निरंतर परिवर्तित होते किरदार को जी पाना आसान नहीं था। रॉबर्ट ने हिटलर के क्रोध में कांपते चेहरे ...घृणा से फूलते-पिचकते उसके नथुने को बखूबी अपने अभिनय में ढाला है। हिटलर जब यहूदियों को जड़ से मिटा देने की बात कहता है, तो उसकी आंखों में साम्प्रदायिकता की भेड़ियानुमा चमक जो आ जाती है, उसे भी राबर्ट सामने लाता है। खैर, यह फिल्म हर पत्रकार और लेखक को इसलिए देखनी चाहिए, क्योंकि इस फिल्म की रूपरेखा या कहें कथा ही एक जर्मन पत्रकार-इतिहासकार Fritz Ger...

बड़ी मां और प्रेमचंद की कहानियों की दुनिया

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Photo by hannah grace on Unsplash By Gulzar Hussain तब मैं बहुत छोटा था, जब मेरी बड़ी मां (चाची) मुझे प्रेमचंद की कहानियों के बारे में बताती थीं। जब वह प्रेमचंद की कहानियों पर चर्चा करतीं, तब मैं घोर आश्चर्य में पड़ जाता, क्योंकि वह पढ़ी-लिखी तो बिल्कुल भी नहीं थीं, फिर कैसे वह कहानियों पर विस्तार से बात कर पाती थीं?तब मैं मुजफ्फरपुर के उस गांव के स्कूल की किताब में पढ़ी गईं प्रेमचंद की कहानियों से ही परिचित था, लेकिन बड़ी मां का कहानी पर चर्चा करने का अंदाज ऐसा था कि मैं अनोखी दुनिया में पहुंच जाता था। वह हर कहानियों के मानवीय पहलू का जिक्र ऐसे करती थी कि आंखें भर आतीं थी। वह कहती- हामिद ऐसा बच्चा था कि उसे कोई खिलौना खरीदने का न सूझा और दादी का चूल्हे के पास बैठकर रोटियां सेंकने में होने वाली तकलीफ याद रही...आह, कैसा दिल वाला बच्चा था वह। मैं यह सुनकर भावुक हो जाता।   'ईदगाह' कहानी पर बोलते-बोलते उनकी आंखें भर आती थीं। हामिद का अपनी दादी के लिए चिमटा लाने का उत्साह हो या उसकी दादी की आंखों में आंसू आ जाने का दर्द हो, सब कुछ वह इस तरह सुनातीं कि कोई टीचर क्या सुनाएगा।   वह ह...