दीपक : लघुकथा

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- शमीमा हुसैन

उसका नाम दीपक था। घर में सब उसे प्यार से दीपू कहकर बुलाते थे। उसके जन्म के साथ सचमुच ऐसा लगा था जैसे उस घर में एक नया दीपक जल उठा हो। पूरा घर खुशियों से भर गया था। माँ-बाप दोनों बहुत खुश थे। दादा-दादी के चेहरे पर भी अलग ही चमक थी। खासकर दादी तो बहुत खुश थीं, क्योंकि इससे पहले घर में दो बेटियाँ थीं और अब एक बेटा हुआ था।

दीपक सचमुच अपने परिवार के लिए दीपक बनकर आया था।

उसका पालन-पोषण केवल उसके माता-पिता ने ही नहीं किया, बल्कि दादा-दादी, नाना-नानी और चाचा-चाची ने भी मिलकर किया। उसके चाचा तो उसे बहुत मानते थे। पता नहीं उन्हें दीपक में क्या दिखाई देता था, लेकिन जब भी घर में कुछ अच्छा बनता, वे सबसे पहले दीपक के लिए निकालकर रखते।

परिवार में बहुत पैसा नहीं था, लेकिन खुशियाँ बहुत थीं। घर में कोई बड़ी बीमारी नहीं थी, न कोई बड़ी मुसीबत। जीवन में मेहनत तो करनी ही पड़ती है और परिवार के सभी लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत करते थे।

धीरे-धीरे दीपक बड़ा होने लगा।

जिस बच्चे के लिए कभी पूरा घर खुशियों से भर गया था, उसी बच्चे के मन में जाने कब एक अलग तरह की इच्छा जन्म लेने लगी। उसे संसार से विरक्ति होने लगी। उसे लगा कि उसे साधु बन जाना चाहिए, मोह-माया से दूर हो जाना चाहिए और सांसारिक जीवन का त्याग कर देना चाहिए।

और एक दिन उसने सचमुच ऐसा ही कर दिया।

वह वृंदावन चला गया और एक आश्रम में रहने लगा।

माता-पिता के लिए यह बहुत बड़ा आघात था। जितना दुख उन्हें हुआ, उसे शब्दों में बयान करना शायद संभव नहीं है। कोई भी माँ-बाप यह नहीं चाहता कि उनका बच्चा उनसे दूर होकर ऐसा जीवन चुन ले, जिसमें वह अपने परिवार और संसार से लगभग पूरी तरह कट जाए।

माता-पिता अपने बच्चों को केवल जन्म ही नहीं देते। वे उन्हें अपनी मेहनत, अपने समय, अपने सपनों और अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा देकर बड़ा करते हैं। बच्चे की पहली मुस्कान से लेकर उसके पहले कदम तक, उसकी पहली पढ़ाई से लेकर उसके बड़े होने तक—हर पड़ाव में माता-पिता का जीवन जुड़ा होता है।

दुनिया भी तो ऐसे ही आगे बढ़ी है।

कहा जाता है कि आदम और हवा के बाद मनुष्य की पीढ़ियाँ बढ़ती गईं। शुरू में जीवन कठिन था। धीरे-धीरे लोगों ने अपनी बुद्धि, मेहनत और अनुभव से दुनिया को बेहतर बनाया। किसी ने खेती सीखी, किसी ने घर बनाए, किसी ने इलाज के तरीके खोजे, किसी ने शिक्षा को आगे बढ़ाया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों ने थोड़ा-थोड़ा योगदान दिया और आज की दुनिया बनी।

तो क्या संसार में रहते हुए भी भलाई नहीं की जा सकती?

क्या अपने माता-पिता की सेवा करते हुए भी ईश्वर को प्राप्त   नहीं की जा सकती?

क्या परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी इंसान एक अच्छा और नेक जीवन नहीं जी सकता?

ये प्रश्न दीपक के माता-पिता के मन में हमेशा बने रहे।

दीपक को आश्रम गए हुए दो वर्ष हो चुके थे। इन दो वर्षों में उसकी माँ ने कई बार अपने बेटे से मिलने की कोशिश की। वह फोन पर बात करना चाहती थी। वह वृंदावन तक गई। लेकिन उसकी माँ के अनुसार, उसे अपने बेटे से मिलने का अवसर नहीं मिल पाया और फोन पर भी ठीक से बात नहीं हो सकी।

शायद दीपक को इन कोशिशों की पूरी जानकारी थी, शायद नहीं। यह बात आश्रम वाले ही बेहतर जानते होंगे। उसकी माँ तो केवल इतना जानती थी कि उसका बेटा उससे दूर था और वह उसे देखने के लिए तरस रही थी।

माँ आखिर माँ होती है।

बच्चा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, माँ के लिए वह वही बच्चा रहता है जिसकी उँगली पकड़कर उसने उसे चलना सिखाया था।

दीपक की कहानी हमें एक और बात सोचने पर मजबूर करती है—किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं होती। चाहे वह संसार हो या संसार से विरक्ति, किसी भी विचार को इतना कठोर नहीं बना देना चाहिए कि इंसान अपने रिश्तों और जिम्मेदारियों को ही भूल जाए।

एकांतवास, ब्रह्मचर्य, मोक्ष और आध्यात्मिक जीवन के बारे में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग धारणाएँ हो सकती हैं। लेकिन इतना तो निश्चित है कि अपने माता-पिता और परिवार के प्रति प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

दीपक के माता-पिता का मानना था कि अगर उनका बेटा उनके साथ रहते हुए 

समाज की भलाई के काम करता, तो शायद वह आध्यात्मिक जीवन का रास्ता भी खोज सकता था।

लेकिन   किस्मत।   ने  कुछ और ही लिखा था।

आश्रम में रहते हुए दीपक ने एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसने उसके परिवार की पूरी जिंदगी बदल दी। वह इस दुनिया में नहीं रहा।

उस घटना के बाद उसके माता-पिता के लिए समय जैसे रुक गया।

जिस बेटे को उन्होंने अपनी उँगली पकड़कर चलना सिखाया था, जिस बेटे के जन्म पर घर में खुशियाँ मनाई थीं, वही बेटा अब उनके पास नहीं था।

उसकी माँ के मन में शायद बार-बार यही सवाल आता होगा—

“मेरा दीपक कहाँ चला गया?”

वह दीपक, जिसे उन्होंने प्यार से पाला था।

वह दीपक, जिसके लिए परिवार में हर त्योहार खास हुआ करता था।

वह दीपक, जिसके भविष्य के लिए उन्होंने न जाने कितने सपने देखे थे।

अब उनके जीवन में केवल उसकी याद बची थी।

और सबसे बड़ा प्रश्न यही था—आखिर ऐसा क्यों हुआ?

इस सवाल का जवाब शायद कभी पूरी तरह नहीं मिल पाएगा।

कहानी में एक और दृश्य बार-बार याद आता है।

एक दिन अचानक छत की ओर से बहुत तेज आवाज आई। आवाज इतनी तेज थी कि आसपास के कुत्ते और बिल्लियाँ डरकर इधर-उधर भागने लगे। उस आवाज ने पूरे वातावरण को हिला दिया।

लोग बाहर निकले।

लेकिन किसी को समझ नहीं आया कि आखिर इतनी तेज आवाज किस चीज के गिरने से हुई।

कई दिनों तक लोग यही सोचते रहे—

“आखिर वह क्या था?”

धीरे-धीरे उस आवाज से जुड़ी सच्चाई सामने आई और पूरा माहौल दुख में बदल गया।

वही गाँव, वही घर, वही लोग—जहाँ कभी एक बच्चे के जन्म पर पूरा परिवार खुश हुआ था, अब उसी परिवार में मातम था।

दरअसल, यह कहानी केवल दीपक की नहीं है।

यह उन तमाम परिवारों की कहानी है जो अपने बच्चों को प्यार से पालते हैं, उनके लिए सपने देखते हैं और फिर किसी दिन उन्हें अपने से बहुत दूर पाते हैं।

दीपक जब पैदा हुआ था, तब वह इतना प्यारा था कि दादी उसे देखते-देखते डरती थीं कि कहीं उसकी नजर न लग जाए। वह गोल-मटोल, मासूम और सुंदर बच्चा था। उसके छोटे-छोटे हाथ-पैर देखकर घर के लोग खुश हो जाते थे।

दादी उसे प्यार से गोद में उठातीं और मन ही मन दुआ करतीं—

“मेरा बच्चा हमेशा खुश रहे।”

उसे सोने की पालना नहीं मिली थी। वह साधारण लकड़ी की पालना में ही बड़ा हुआ था। लेकिन उस पालने में प्यार की कोई कमी नहीं थी।

उसके माता-पिता ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसे पढ़ाया। स्कूल में उसका नाम लिखाया। उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखा। वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।

किसी को क्या पता था कि जिस बच्चे के आने से घर में दीपक जला था, एक दिन वही दीपक अपने परिवार के जीवन में इतना बड़ा अंधेरा छोड़ जाएगा।

शायद दीपक को कोई समय रहते यह समझा पाता कि सांसारिक जीवन बुरा नहीं है।

परिवार के साथ रहते हुए भी इंसान अच्छे काम कर सकता है।

माता-पिता की सेवा करते हुए भी ईश्वर को याद कर सकता है।

समाज की भलाई करते हुए भी आध्यात्मिक जीवन जी सकता है।

जीवन से भाग जाना ही मुक्ति का रास्ता नहीं होता।

कभी-कभी अपने रिश्तों, जिम्मेदारियों और अपनों के दुख को समझते हुए जीवन जीना भी बहुत बड़ी साधना होती है।

दीपक की कहानी का सबसे दुखद हिस्सा यह नहीं था कि वह आश्रम चला गया।

सबसे दुखद बात यह थी कि दीपक बुझ गया।

और उसके साथ उसके माता-पिता के जीवन का एक ऐसा हिस्सा भी बुझ गया, जिसे वे शायद आखिरी साँस तक फिर कभी रोशन नहीं कर पाएँगे।

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