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लघुकथा : उसकी पीठ की धारियां

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Meta AI Image उसने जिस दिन अपनी पीठ दिखाई थी, उस दिन हम फिर से स्कूल की पीछे छूट गई दुनिया में लौटने लगे. उसकी पीठ पर जेब्रा के शरीर की तरह धारियां थीं. पूरी पीठ धारियों से भरी थी. ये धारियां हल्की थीं, लेकिन स्थायी थीं. ये धारियां उसे स्कूल के किसी भयावह दिन में ले गईं. वह मेरी ओर बिना देखे बोलता रहा और मैं आश्चर्य से उसके चेहरे को पढ़ता रहा. यह उन दिनों की बात थी जब हम दोनों आठवीं कक्षा में थे. किसी दिन उसने अपना होमवर्क ठीक से नहीं किया था. शायद इतनी सी ही बात थी या इससे भी छोटी कोई वजह. अंग्रेजी का वह शिक्षक उस दिन किसी निर्दयी हमलावर में तब्दील हो गया था. मजबूत छड़ी से शिक्षक ने उसकी पीठ पर वार करना शुरू किया. वह चीख रहा था ...गिड़गिड़ा रहा था, लेकिन उसने एक नहीं सुनी. वह तबतक उसे पीटता रहा जब तक उसकी शर्ट खून से लाल नहीं हो गई. टिफिन की घंटी बजी, तो छड़ी थम गई, लेकिन उसकी सिसकियाँ नहीं थमीं. मैं दूसरे सेक्शन में था इसलिए मुझे कुछ पता नहीं था. 'लेकिन तुमने उसका विरोध क्यों नहीं किया?' मैंने पानी का ग्लास अपने होंठों से लगाते हुए कहा. उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, 'उस उ...

न्याय पाने की तड़प से भरी हैं निर्मला गर्ग की कविताएं

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  निर्मला गर्ग का कविता संग्रह  'अनिश्चय के गहरे धुएं में' मैंने उनसे जब भी बात की, उन्हें देश के वंचित जनों की चिंता-फिक्र में पाया ...देश में माइनॉरिटी, दलित, आदिवासी की लगातार पिछड़ती आर्थिक-सामाजिक स्थिति को कैसे ठीक किया जाए, इस पर विचार-विमर्श करते पाया। ...हां, निर्मला गर्ग के व्यक्तित्व को और एक कवयित्री के रूप में उनके चिंतन को उनसे बातें करते हुए मैं जितना समझ पाया, उससे यही लगा कि इस कवयित्री की लिखी हर पंक्ति इस देश को और बेहतर बनाने की एक ठोस पहल है। इस साल निर्मला गर्ग का काव्य संग्रह 'अनिश्चय के गहरे धुएं में' पढ़ने का मौका मिला। इस संग्रह को पढ़ने के बाद सबसे पहले जो बात मेरे मन में आई, वह यही आई कि इस संग्रह की कविताएं सम्मोहित नहीं करतीं, बल्कि न्याय पाने की तड़प और बेचैनी से भर देती हैं। दरअसल, ये कविताएं जुल्म के प्रतिकार और अस्वीकार की कविताएं हैं। फासिस्टों से लड़ने वालों के लिए समर्पित इस काव्य संग्रह की कविताएं मानवता को बचाए रखने के प्रयासों को शिद्दत से रेखांकित करती चलती हैं। इस संग्रह में 'ईश्वर : कुछ कविताएं' में उनकी शुरुआती पंक्ति...

सत्य की खोज करती हैं पंकज चौधरी की कविताएं : गुलज़ार हुसैन

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सेतु प्रकाशन से प्रकाशित पंकज चौधरी का कविता संग्रह गुलज़ार हुसैन बहुत पहले जब मैं पटना में पंकज चौधरी से मिला था, तब मैं कभी उनके टेबल पर अधखुली रखी मोटी सी फैज की किताब की ओर देखता था और कभी उनके चेहरे की ओर देखता था ...उस दिन वे जातिवाद, सांप्रदायिकता और स्त्री विरोधी मर्दवाद की जमकर धज्जियां उड़ा रहे थे। उनके बोलने का अंदाज ऐसा था कि उस दिन मैंने यह समझ लिया था कि यह कवि जब भी कलम उठाएगा, तो दुर्व्यवस्था और नाइंसाफी के खिलाफ मशाल ही जलाएगा। आज जब हाल ही में प्रकाशित उनके दूसरे काव्य संग्रह 'किस-किस से लड़ोगे' को पढ़कर उठा हूं, तो मेरी सोची हर बात सही साबित होती लग रही है। आज यह सबसे बड़ी सच्चाई है कि हिंदी पट्टी वाले राज्यों के अलावा दूसरे राज्यों में भी चुनाव प्रछन्न रूप से जातिवाद और सांप्रदायिक मुद्दों पर ही हो रहे हैं, लेकिन साथ ही हकीकत यह भी है कि जातिवाद जैसी खतरनाक सियासी हथियारों के खिलाफ साहित्य जगत में एक सन्नाटा सा पसरा है। ऐसे समय में 'किस-किस से लड़ोगे' काव्य संग्रह वर्तमान परिदृश्य में साहित्यिक-क्रांति की शुरूआत की तरह सामने आई है। मैं इस संग्रह को प...

गुलज़ार हुसैन की कविताएं आपका चैन छीन सकती हैं : पंकज चौधरी

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न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित गुलजार हुसैन की पुस्तक  पंकज चौधरी   "एक अच्छी कविता वह है जिसे पढ़ते हुए कोई रो दे लेकिन उससे भी अच्छी कविता वह है जिसे पढ़ते हुए मन कुछ बेहतर करने की तड़प से भर जाए।" उपर्युक्त काव्य पंक्तियां प्रखर कवि-पत्रकार गुलजार हुसैन की हैं। गुलजार की कविताएं हमें प्रेरित करती हैं। वे हमें जगाने का काम करती हैं। वे उन योद्धाओं में जज्बा भरने का काम करती हैं जो असफल, हताश और निराश होकर बैठ जाना चाहते हैं। वे कुंवर नारायण के शब्दों में कहना चाहती हैं कि हारा वही जो लड़ा नहीं। ये उनकी कविताएं हैं जो किसी भी बाधा, अड़चन, मुश्किल और चुनौती में रुका नहीं। सवाल यह पैदा होता है कि जो कवि इतनी हिम्मत, बहादुरी, धैर्य और दूर-दृष्टि से लैस होने की बात अपनी कविता में करता है, आखिर उसका राज क्या है? इसका जवाब है कि गुलजार का जन्म एक अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ। मजदूरी करके पढ़ाई-लिखाई की। नौकरी की तलाश में मुंबई जैसे महानगर पहुंचे। वहां भी कुछ दिनों तक मजदूरी की। ट्यूशन पढ़ाया। स्कूलों में नौकरी की। छोटी-छोटी पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की। उनके संपादकीय विभ...

लघुकथा : सोनपुर मेला

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Photo META AI IMAGE  लघुकथा :शमीमा हुसैन   ''मार-पीट कर अब उसे छत्तर मेला (सोनपुर मेला) में बेच दो। शादी के चार-पांच साल हो गए हैं और अब वह मेले में बिकने जाएगी।''   यह बात कहने वाली कौन थी? यह सोनपुर वाली थी। दूर की मेरे सास की चाची। वह बाहर वाली थी, फिर भी घर वाले उसे मानते और उसकी बात का मान रखा जाता। पर वह मुझे रत्ती भर भी नही सुहाती। फिर भी उसके आने पर मैं उन्हें सलाम कर देती थी यहां तक कि मुझे पैर भी दबाना पड़ा। वह जब मजार पर जाती, तो वापस आने पर उसका आंचल सीधा होता और जाते समय आंचल उल्टा होता। मैं यह देखकर मन ही मन मुस्काती। यह दो पल का ईमान है। कुछ देर बाद भर-भर कर बुराई करेगी, तभी इसके पेट के पानी पचेगा। बस यह किस जन्म का बदला ले रही है। यह मैं जानती हूं। यह इसी जन्म की बात है।  जब उसकी शादी हुई थी, तब उसकी सास, ननद, पति, देवर सभी तलवार की तरह उनके सर लटके रहते थे। एक दिन सोनपुर वाली अपनी कहानी सुनाने लगी- ''...मैं चार बजे रोज उठ जाती थी। पर एक दिन मन खराब था। सात बजे उठी। मेरी सास ने किचन में घुसने नही दिया और पति को बोलकर मार खिलवाया।'' चार...

...जब हिटलर के खूंखार सैनिकों से भिड़ गई वह लड़की

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Meta AI Image/  symbolic image स्टीफन स्पीलबर्ग की फिल्म सिंडलर्स लिस्ट का एक दृश्य एक क्रांतिकारी कविता की तरह दर्शकों के दिलो दिमाग पर छा जाता है। दरअसल, यह दृश्य सच कहने वाली साहसी लड़की डायना रिटर (Diana Reiter) से जुड़ी सच्ची घटना पर आधारित है। ...तब जर्मनी में हिटलर ने ऐसी सांप्रदायिक सियासत फैलाई थी कि यहूदियों को बिना किसी वजह के मौत के घाट उतार दिया जा रहा था। उस समय यहूदी पोलिश लड़की डायना, जो इंजीनियर थी, उसे लगा कि कारकोव में जो बैरेक का फाउंडेशन बन रहा है, उसका निर्माण बिल्कुल गलत तरीके से हो रहा है। उसने तब के प्रभारी अधिकारी अमोन गोएथ के सामने ही इसका विरोध जताते हुए कहा कि इसे तुरंत फिर से बनाया जाए, नहीं तो यह बाद में गिर जाएगा और बहुत सारे लोग मारे जाएंगे। गोएथ घोर सांप्रदायिक सरकारी अधिकारी था। उसने घृणा से जवाब दिया कि कोई फर्क नहीं पड़ता है, निर्माण ऐसे ही होगा। तब डायना ने कहा- मैं यहां की इंजीनियर हूं। मेरी जिम्मेदारी है कि यह कहूं। गोएथ- अच्छा, तुम पढ़ी लिखी हो। डायना -हां, ग्रेजुएट हूं। गोएथ ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा -"पढ़ी लिखी यहूदन, जैसे कार्ल मार्क्स...

बदलता मौसम : लघुकथा

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Meta AI Image by Shamima Hussain  लघुकथा : शमीमा हुसैन आज जुलाई की बारह तारीख है। कल से झमाझम बारिश हो रही है। फिजा कल काम से आई और सीधे बिस्तर पकड़ ली। माँ ने उसे रात को नौ बजे खाने के लिए उठाया।  फिजा ने करवट बदलते हुए आंखें खोली और माँ की ओर देखते हुए कहा, ''मैं थोड़ी देर में आती हूं।'' आधा घंटा हो गया, पर फिजा खाने के लिए नहीं आई।  माँ फिर आई और कहा, ''चलो फिजा खाना खा लो।''  फिजा ने आंखें मलते हुए कहा, ''हां अम्मी, भूख तो जोरों की लगी है। चलो।'' फिजा दुपट्टा उठा कर चलने लगी। वह मुश्किल से दो कदम ही चली होगी कि उसे चक्कर आया और वह नीचे बैठ गई। ''अरे क्या हुआ तुझे?'' मां ने उसे झुककर उसे संभालते हुए पूछा। फिजा ने उसके चेहरे की ओर देखा।  ''सुन, तू कल छुट्टी ले ले और आराम कर ले। थक जाती है।'' मां ने उसे उठाते हुए कहा।     फिजा ने खाते हुए सोचा कि चार, पांच दिन पहले से ही उसे पीरियड आने की तकलीफ शुरू हो जाती है। चक्कर आने से  पूरे बदन में दर्द और दोनों पिंडलियों में टेटनी होने लगती है। आज भी ऐसा ही हाल था उ...