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In pics: मुंबई में रिमझिम बारिश

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मुंबई में बारिश शुरू हो गई है। रिमझिम फुहारों से सड़कें चमकने लगी हैं। बच्चे छतरी लेकर घरों से बाहर निकलने लगे हैं। आपके लिए इन दृश्यों को मैंने कैमरे में कैद किया है। देखिए- (सभी तस्वीर: गुलज़ार हुसैन)

क्या आपने इस गंभीर चेहरे वाले अभिनेता की फिल्में देखी हैं?

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(द फादर के एक दृश्य में बेंजामिन और सुप्रिया पाठक) by Gulzar Hussain ये बेंजामिन गिलानी (Benjamin Gilani)  है ...उदास सा...मंद-मंद मुस्काने वाला एक गंभीर अभिनेता... बचपन में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के दौर की याद जब भी मन में कौंधती है, इस गंभीर चेहरे वाले अभिनेता का चेहरा सामने आ जाता है। न जाने कितने धारावाहिकों और टेली फिल्मों में इसके जिंदादिल अभिनय ने मन को झंझोड़ा है। मन में एक कसक भी उठती रही है कि इतने अच्छे अभिनय के बावजूद आखिर क्यों बेंजामिन फिल्मी दुनिया में चर्चित नाम नहीं है। खैर, इधर फिर बेंजामिन अभिनीत एक टेली फिल्म देखी। यह मोपांसा की कहानी द फादर पर बनी है। इसमें बेंजामिन ने एक ऐसे लापरवाह प्रेमी की भूमिका की है, जो झकझोरती है ...बेचैन करती है ... फ़िल्म में बेंजामिन एक युवती से बहुत प्यार करता है, लेकिन एक दिन वह अचानक बिना किसी को बताए शहर छोड़ कर भाग जाता है। इधर उसकी प्रेमिका (सुप्रिया पाठक) उसकी याद में बहुत रोती है ...बिलखती है। फिर बहुत दिनों बाद जब बेंजामिन उसी शहर में लौटता है, तो उसे एक बच्चा दिखाई पड़ता है, जो ठीक उसके अपने बचपन की तस्वीर से मिलता जुलता है। जब ...

लघुकथा : लॉकडाउन का भाड़ा

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Photo: Vijayendra Mohanty on Unsplash - शमीमा हुसैन मकान मालिक- क्‍यों, कब भाड़ा दे रहो हो? किराएदार- सेठ, कोरोना के कारण मेरा काम पूरा चौपट हो गया। रोटी के लाले पड़ गए थे।समय बहुत ही खराब हो गया था। इसके लिए गांव भागा, लेकिन वहां भी कर्ज लेकर पेट भरने का इंतजाम किया।   मकान मालिक- तो मैं क्‍या करूं तुम्‍हीं बताओ। किराएदार- लॉकडाउन मार्च से शुरू हुआ था और मैंने उस समय भाड़ा दे दिया था। अब अप्रैल से लेकर अक्‍टूबर तक का भाड़ा बाकी है। मकान मालिक- तुम्‍हारा डिपॉजिट खत्‍म हो गया है और तुम माइनस में हो। किराएदार- हां, सेठ। जानता हूं। मैं सारा भाड़ा चुका दूंगा ...लेकिन अभी भी मेरा काम ठीक से चल नहीं रहा है। आप तीन महीने का भाड़ा तो माफ कर दीजिए। मकान मालिक- (गुस्‍से में) ऐसा कैसे हो सकता है। माफ कर दूं तो मैं रोड पर आ जाउंगा। किराएदार- सेठ, दो महीने का तो माफ कर दीजिए। मकान मालिक- नहीं ऐसा नहीं हो सकता है। सुनो, 70 हजार भाड़ा बनता है, लाकर दो। नहीं तो घर खाली करो। किराएदार- नहीं सेठ, ये नहीं हो पाएगा। (उदास होकर) थोड़ा-थोड़ा करके भाड़ा चुका दूंगा। मकान मालिक- क्‍या डेरवा पोठिया दोगे। एक ...

In Pics: मुंबई की रफ्तार

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कोरोना की दूसरी लहर मुंबई (Mumbai) को फिर से तंग कर रही है। नाइट कर्फ्यू है, लेकिन मुंबई की रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही है। मेहनतकश लोग रोजी रोटी के लिए खूब पसीना बहा रहे हैं।  सभी फोटो: गुलज़ार हुसैन

भारत की राजनीति में महुआ मोइत्रा का होना, देश का जिंदा रहना है

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By Gulzar Hussain  टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा का भारत की राजनीति में होना गर्व की बात है। जिस तरह से लोकसभा में उन्होंने मोदी सरकार की गिन- गिन कर पोल खोली है, उसे एक ऐतिहासिक मोमेंट कहा जा सकता है। जिस तरह भारत में सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के तले लोगों को को घुटन भरे माहौल में रहने को मजबूर किया जा रहा है, उन सियासी साजिशों का पर्दाफाश जरूरी था। मोइत्रा ने केंद्र सरकार पर कायरता को साहस के रूप में परिभाषित करने का आरोप लगाया है, जो ऐसे समय में एक साहस भरा काम है। ऐसे समय में जब संसद में जन आंदोलनकारियों को परजीवी कहकर मजाक उड़ाया जा रहा हो, तब लोकसभा में महुआ को सुनना ऐतिहासिक लम्हा था।  महुआ ने वर्तमान समय में सत्ता की हर नीति की पोल खोल कर रख दी। मुझे ध्यान नहीं आता कि पिछले एक दशक में इस तरह किसी अन्य महिला नेता ने सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ लोकसभा में खुलेआम इतने गंभीर तरीके से चोट करते हुए जेनुइन मुद्दे पर घेरा है।  मोइत्रा (Mahua Moitra) ने लोकसभा के अंदर कहा कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लाना, अर्थव्यवस्था की स्थिति और बहुमत के बल पर तीन कृषि कानून (Farm Laws) लान...

अभी अधूरा है सफदर का नुक्कड़ नाटक

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By Gulzar Hussain हां, वह जनवरी का ही महीना था, जब सफदर हाशमी उस नुक्कड़ नाटक को पूरा नहीं कर पाया था।  हां, ‘हल्ला बोल’ केवल नुक्कड़ नाटक ही नहीं था, बल्कि वह उसका सपना था। वह सपना अपने देश को और बेहतर बनाने का था। ...वह सपना मिलों-कारखानों में जानवरों की तरह पिसते मजदूरों को अधिकार दिलाने का था ...वह सपना झोंपड़ों में रहने वाले गरीब बच्चों के जीवन स्तर को उठाने का था, लेकिन तब सत्ता और सियासत के दमनचक्र ने उस सपने को कुचलने की कोशिश की। उस नुक्कड़ नाटक के दौरान ही सियासी गुंडों ने उसकी पूरी टीम पर हमला किया।  जब घायल होकर सफदर 2 जनवरी (1989) को दम तोड़ रहा था, तब वह अपना सपना अपने साथियों को सौंप रहा था। उसके और उसके साथियों के सपने घुल-मिलकर तूफानी सपने बन गए। सफदर की मौत के दो दिन बाद ही उसकी पत्नी मल्यश्री हाशमी उसी टीम के साथ दोबारा उसी जगह पर अधूरे नाटक को पूरा करने गई।  बस यही ...हां, यही साहस हर सपने को पूरा करने के लिए जरूरी है। सपने की कड़ी से कड़ी जुड़नी चाहिए। ...उसके बाद हम और हमारे बाद वे...ऐसे ही तेज होनी चाहिए सपनों को पूरा करने की रफ्तार... कौन कहता है कि 2 जनवर...

संकट के समय जीने का हौसला देती किताब

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संकट के समय कुछ किताबें आपको जीने का हौसला देती हैं। हेलन केलर की आत्मकथा भी ऐसी ही रोशनी मुझे दे रही है।  यह एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसमें देखने, सुनने और बोलने क्षमता नहीं है, लेकिन वह लोगों के दुख, तकलीफ और अन्याय को देख पाती है ...वह वंचित जनता के हकों के लिए आंदोलनों में भाग लेती है ... वह मजदूरों, खेतिहर किसानों के हक के लिए झकझोरने वाले लेख लिखती है।  एकबार एक कट्टर व्यक्ति ने उसके बारे में कहा कि शारीरिक रूप से कमजोर हेलन को आंदोलनों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए, तो हेलन ने जवाब दिया- "आंखें होते हुए भी न देख पाना दृष्टिहीन होने से कहीं ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है।" मैं ज्यों-ज्यों इस पुस्तक में खोता जा रहा हूं, त्यों-त्यों समंदर सा मजबूत साहस मेरे अंदर हिलोरें लेता हुआ महसूस हो रहा है। इस पुस्तक की हर पंक्ति कहती है मुझसे ...उठो, आगे बढ़ो। -गुलज़ार हुसैन