ओ बच्चे, तुम आत्महत्या नहीं करोगे : लघुकथा


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-नायला अदा


सनी तेरह साल का दुबला-पतला, चुप-सा बच्चा था। स्कूल में उसकी उपस्थिति किसी साए की तरह थी—दिखाई तो देता था, पर महसूस कम होता था। वह ज़्यादातर समय अपनी सीट पर सिर झुकाए बैठा रहता, जैसे दुनिया उससे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रही हो और वह उसके पीछे कहीं धूल में छूट गया हो।


टीचर मिस्टर गुप्ता उसे रोज़ किसी न किसी बात पर डांट देते—कभी होमवर्क अधूरा, कभी क्लासवर्क कम, कभी बस इसलिए कि वह “ध्यान नहीं देता।”

सनी सच में ध्यान नहीं दे पाता था। बोर्ड पर लिखी लाइनें उसके लिए धुंधली नहीं थीं, मगर समझ के पार थीं। उसका दिमाग मानो कुछ और ही सोचता रहता—क्या, उसे खुद भी ठीक से नहीं पता था।


क्लासमेट्स भी उसे ज़्यादा घुलने नहीं देते। “बोलता नहीं”, “अजीब है”, “हमेशा खोया रहता है”—ऐसे लेबल उसकी पीठ पर चिपक गए थे। धीरे-धीरे वह खुद भी मानने लगा था कि शायद उसके अंदर सच में कुछ गड़बड़ है।


एक दिन, जब मिस्टर गुप्ता ने पूरी क्लास के सामने उसे ज़ोर से डांटा—“ये लड़का कुछ नहीं कर पाएगा”—तो अंदर कुछ टूट-सा गया।

सनी ने पहली बार सोचा कि शायद… शायद वह सच में कुछ नहीं कर पाएगा।


उस दिन स्कूल से घर लौटते वक्त उसके कदम भारी थे। गली के मोड़ से गुजरते हुए उसने सोचा—“अगर मैं ही नहीं रहूँगा तो क्या फर्क पड़ेगा?”

यह सोच उसे खुद से डराने लगी, पर वह उसे झटक नहीं पा रहा था।


रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे उसने अपना चेहरा तकिये में दबा लिया। मन में बस एक ही गूंजती आवाज़—“कुछ नहीं कर पाएगा… कुछ नहीं कर पाएगा…”


अगले दिन स्कूल जाने का मन नहीं हुआ, फिर भी वह चला गया। क्लास के बाद वह लाइब्रेरी में जाकर एक कोने में चुपचाप बैठ गया। यहाँ कम-से-कम कोई उसे “बेकार” नहीं कहता था। वही शांति उसे थोड़ी राहत देती थी।


लाइब्रेरी के एक शेल्फ से एक किताब ज़मीन पर गिरी—जैसे उसे बुला रही हो। सनी ने किताब उठाई। नाम पढ़ा—“तुम अकेले नहीं हो”।

एक सरल-सी किताब। बहुत भारी-भरकम बातें नहीं थीं, लेकिन शब्द ऐसे थे जैसे किसी ने उसके मन को पढ़ लिया हो।


वह पन्ने पलटने लगा—

कहानी एक बच्चे की थी जो स्कूल में परेशान था, खुद को बेकार समझता था, लेकिन धीरे-धीरे समझता है कि गलत वह नहीं, बस हालात हैं।

एक लाइन ने उसे पकड़ लिया—

“किसी एक दिन की हार यह साबित नहीं करती कि तुम हारने वाले इंसान हो।”


सनी रुका।

उस लाइन को दोबारा पढ़ा।

और तीसरी बार भी।


उसे लगा जैसे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा हो—नरमी से, बिना झिझक, बिना ताने।


किताब में लिखा था कि हम अक्सर अपने बारे में वही मान लेते हैं जो लोग कहते हैं, लेकिन सच वह नहीं होता। सच यह होता है कि हर इंसान की अपनी चमक होती है—बस कभी-कभी मिट्टी की परत चढ़ जाती है।


सनी अचानक से शांत होने लगा।

उसे लगा—“अगर इस कहानी वाला बच्चा बदल सकता है, तो मैं क्यों नहीं?”


किताब के आख़िरी पन्ने पर लिखा था—

“अगर मन अंधेरे में फँसा हो, तो रोशनी ढूँढने के लिए मदद माँगो। रोशनी शर्माती नहीं, बस कभी-कभी दूर खड़ी रहती है।”


सनी की आँखें गर्म हो गईं, पर इस बार दर्द से ज़्यादा राहत से।

उसे पहली बार लगा कि शायद उसके अंदर भी कुछ अच्छा छिपा है।


उसने फैसला किया—आज वह घर जाकर माँ को सब बताएगा।

डर लग रहा था, पर किताब ने कहा था—“मदद माँगने में हिम्मत लगती है।”


उस दिन सनी ने पहली बार खुद को कमज़ोर नहीं, बहादुर महसूस किया।


घर पहुँचकर उसने माँ को धीमी आवाज़ में बताया, “मुझे बहुत बुरा लगता है… जब टीचर कहते हैं कि मैं कुछ नहीं करूँगा।”

माँ ने उसे कसकर गले लगा लिया।

“तू बहुत प्यारा बच्चा है, सनी। बस तुझे ये दुनिया अपने तरीके से समझनी है। हम साथ हैं, न?”


यह “हम साथ हैं” सुनकर सनी को लगा जैसे उसके कंधों से भारी बोझ उतर गया हो।


अगले दिनों में माँ स्कूल गईं, टीचर से बात की।

लाइब्रेरी की मिस रेणुका ने सनी को और किताबें सुझाईं।

कुछ क्लासमेट्स उससे धीरे-धीरे बातें करने लगे।

सब कुछ तुरंत सही नहीं हुआ, पर कुछ बदलने लगा था।


और सबसे ज़रूरी—

सनी के भीतर फिर से “जीने” का बीज उगने लगा था।


अब वह हर हफ्ते एक किताब पढ़ता।

हर किताब उसे एक नया ताला खोलना सिखाती।

और वह अपनी दुनिया को थोड़ा और रोशन करता जाता।


उस दिन को याद करते हुए सनी मन ही मन कहता—

“एक किताब ने मुझे बचा लिया… और शायद मेरी कहानी भी किसी को बचा सकती है।”



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