संदेह के साये : लघु कथा

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-नायला अदा

अर्मान 25 साल का एक साधारण-सा युवक था। एक छोटे से शहर में पला-बढ़ा, वहीँ की एक कंपनी में नौकरी करता था। उसकी ज़िंदगी में सब कुछ सामान्य ही था, बस एक बात उसे ख़ास बनाती थी—उसका प्यार। सलमा, जिसे देखकर उसके दिल में पहली बार धड़कनें तेज़ हुई थीं। सलमा उसके ही मोहल्ले में रहती थी और दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। समय के साथ दोस्ती का यह रिश्ता प्यार में बदल गया।

अर्मान शर्मीला स्वभाव का था, पर सलमा से बात करते समय उसकी झिझक कहीं खो जाती। सलमा भी उसे पसंद करती थी, पर समाज और घर के दबाव को देखते हुए वह अपने भावों को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाती थी। दोनों का रिश्ता अनकहा होते हुए भी गहरा था।

एक दिन की बात है। अर्मान ऑफिस से लौट रहा था। रास्ते में उसने सलमा को किसी युवक के साथ देखा। वह युवक लंबा-सा, साफ-सुथरे कपड़ों में, हँसते हुए उससे बातें कर रहा था। सलमा भी मुस्कुरा रही थी। अर्मान उनकी नज़दीकियाँ देखकर ठिठक गया। वह दूर से ही चुपचाप उन्हें देखता रहा। उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठ पड़ा—"ये कौन है? सलमा ने कभी इसके बारे में क्यों नहीं बताया?"

उस रात अर्मान सो नहीं सका। उसने कई बार मोबाइल उठाया कि सलमा से पूछे, पर फिर रुक गया। "अगर वह सचमुच किसी और को पसंद करती है तो? मैं ही मूर्ख साबित न हो जाऊँ?"

अगले कुछ दिनों में उसने सलमा में बदलाव महसूस किए बिना ही ढूंढ लिए। वह हर बात में शक करने लगा था। सलमा जब हँसकर बात करती तो उसे लगता वह झूठ बोल रही है। वह मिलने में बहाने बनाने लगी—असल में वह अपने रिश्तेदार की शादी की तैयारियों में व्यस्त थी—पर अर्मान को लगा वह उससे दूर हो रही है।

धीरे-धीरे उसने सलमा से बात कम कर दी। कॉल उठाना बंद कर दिया। मैसेज के जवाब न देना उसकी आदत बन गई। वह खुद की भावनाओं को "आत्मसम्मान" का नाम देकर चुपके से उससे रिश्ता तोड़ चुका था।

उधर सलमा बार-बार पूछती रही—"अर्मान, सब ठीक है? तुम ऐसे दूर क्यों हो?"
पर अर्मान हर बार गोलमोल जवाब देकर बच निकलता। सलमा समझ न पाई और धीरे-धीरे उसने भी बात करना कम कर दिया।

कुछ महीनों बाद सलमा के घर वालों ने उसकी शादी किसी और लड़के से पक्की कर दी। सलमा रोई, घरवालों से बहस की, पर किसी ने उसकी नहीं सुनी। उसे लगा अर्मान ही उससे दूर हो गया है, तो वह और लड़ती भी कैसे? मजबूर होकर उसने हाँ कर दी।

शादी हो गई। सलमा अपने नए घर चली गई। मोहल्ले की गलियाँ, बचपन की यादें और वह अनकहा रिश्ता सब सूने रह गए।

एक दिन अर्मान बाज़ार से गुजर रहा था कि रास्ते में पुराने पड़ोसी चाचा मिले। बातचीत के दौरान वह वही युवक भी वहीं आया जिसे अर्मान ने उस दिन सलमा के साथ देखा था। चाचा ने मुस्कुराकर परिचय कराया—
"अरे अर्मान, मिलिए इससे। ये सलमा का दूर का मौसेरा भाई है। शादी में आया था।"

अर्मान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। दिल में गहरे धँसा संदेह टूटकर बिखर गया। उसे अहसास हुआ कि जो रिश्ता उसने अकेले ही तोड़ा था, वह उसकी ही गलतफ़हमी की उपज थी।

उस शाम घर लौटकर वह बहुत देर तक चुप बैठा रहा। उसकी आँखों में पछतावे के आँसू थे। उसने सोचा—
"कितना आसान था पूछ लेना, समझ लेना… लेकिन मैंने चुना संदेह को।"

अब उसके पास सिर्फ यादें थीं। सलमा खुश थी या नहीं, वह नहीं जानता था। पर एक बात वह जरूर समझ चुका था- प्यार भरोसे से चलता है, और एक गलतफ़हमी बहुत दूर ले जाती है। संदेह ने जो छीना, उसे अब कोई वापस नहीं ला सकता था।

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