चाय का कप : लघुकथा
-नायला अदा
रेहाना की उम्र तो बस पंद्रह बरस थी, पर उसकी आंखों में वक़्त की धूल जमी थी। बचपन उसे छूकर भी नहीं गया था। सुबह की पहली अज़ान के साथ वह उठती, गली-गली के घरों में काम करती — बर्तन, झाड़ू, पोंछा और कभी-कभी चूल्हे की तपिश भी झेलती।
उस रोज़ अमजद साहब के घर उसने जल्दी-जल्दी काम निपटाया। उन्हें चाय बनाकर कमरे में ले जा ही रही थी कि हाथ काँप गया। कप ज़मीन पर गिरा — और जैसे ही गिरा, सन्नाटा टूट गया।
"अरे हरामखोरी की हद है! तमीज़ नहीं है चाय देने की?" अमजद की आवाज़ में जहर था।
रेहाना ने सिर झुका लिया, "गलती हो गई, साहब..."
लेकिन माफी मांगने से पहले ही एक झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। अमजद की बीवी ने थप्पड़ों से अपना गुस्सा उतारा, और फिर दोनों ने उसे पीट-पीटकर जैसे अपनी हैसियत जताई।
रेहाना के फटे दुपट्टे और सूजे गालों के बीच, उसकी चुप आंखें कुछ बोल गईं — दर्द की जुबान दुनिया को अक्सर देर से समझ आती है।
मगर मोहल्ले की औरतों ने देखा, सुना... बात एक समाजसेवी तक पहुँची। केस दर्ज हुआ। और एक दिन वही अमजद अदालत की चौखट पर खड़ा था — शर्मिंदा, लेकिन देर से।
बरसों बाद, रेहाना एक बालिका संरक्षण गृह में लड़कियों को पढ़ाती थी। वह हर छोटी लड़की को सिखाती —
"हम टूटे हुए कप नहीं हैं। हम इंसान हैं। और हमारी इज़्ज़त हर चाय के प्याले से ज़्यादा नाज़ुक और कीमती है।"

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