खाड़ी का आईना : लघुकथा



AI Image


-शमीमा हुसैन 


पानी साफ था। इतना साफ कि अपना चेहरा थोड़ा झुकाकर आईने की तरह देखा जा सकता था। मैं पानी देखकर हैरान हो गई—एक तरफ इतना प्रदूषण और दूसरी तरफ इतनी सफाई! एक लंबी खाड़ी के सामने मैं खड़ी थी। पानी चांदी की तरह चमक रहा था।


हम थोड़ी दूरी पर थे, जहां कबूतरों की बारात लगी हुई थी। किसी ने राजमा और गेहूं बिखेर दिया था। कबूतर बड़े ही प्यार से गेहूं खा रहे थे। कबूतरों के झुंड से थोड़ी दूर एक सफेद चिड़ियों का झुंड था। सारी चिड़ियाँ चांदी के वर्क जैसी लग रही थीं। हवा तेज नहीं थी, लेकिन खाड़ी की थोड़ी-सी हवा भी बहुत ज़्यादा लग रही थी।


मेरे बाल खुले हुए थे। हवा मेरे बालों से खेलने लगी। बाल मेरे चेहरे और आंखों में उड़ने लगे। मैं उस पल के जादू में खो गई।


ऐसे ही नज़ारे दूर तक फैले थे। मैं चलती गई। चलते-चलते प्यास लग गई। कई लोग पानी बेच रहे थे। एक महिला भी पानी बेच रही थी। पानी, कबूतर, हवा के साथ-साथ मैं और भी बहुत कुछ देख रही थी।


वह पानी वाली बड़े ही मीठे स्वर में गा रही थी — "ठंडा-ठंडा बिसलेरी पियो..." वह मेरे पास दो-तीन बार होकर गई। मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई —

"आंटी! पानी दो, पानी!"


पानी वाली थोड़ी दूर थी लेकिन मेरी आवाज़ सुन ली। वह फटाफट आई और मुझे पानी दिया। मैंने पानी पिया, लेकिन पैसा नहीं दिया। आंटी बोली,

"पैसा दो, मैं अब घर जाने वाली हूँ।"


मैं बोली,

"आंटी बैठो मेरे पास, थोड़ी देर में पैसा दे रही हूँ।" 


"नको बहिनी, घड़ी जात पोरा, नाइट में कामाला जातो लौकर, जेवण करी..."


फिर भी मैंने कहा —

"बैठो आंटी!"


इस बार मेरी आवाज़ में आदेश था।


आंटी मेरे पास आकर बैठ गईं। मैंने बात शुरू की —

"अच्छा आंटी, आप यहां रोज़ पानी बेचने आती हो?"

"हाँ, रोज़ आती हूँ।"


"ये नज़ारे रोज़ देखती हो?"

"हाँ, मेरा काम है।"


मैंने फिर से पूछा —

"ये नज़ारे रोज़ देखती हो? ये जो बाढ़ की तरह फैला हुआ है... बारह, तेरह, सोलह साल के बच्चे... जो एक-दूसरे में ऐसे गुथे हैं, जैसे किसी के होंठ किसी के गले पर हों। ये बच्चे व्यस्कों से ज़्यादा प्यार जताने की होड़ में एक-दूसरे के अंदर घुस जाने की कोशिश कर रहे हैं। उम्र से पहले सब कुछ पा लेना है... क्या इन्हें मरने की भी जल्दी है?"


आंटी बोलीं —

"हाँ, ये रोज़ ही रहता है। किसी दिन ज़्यादा, किसी दिन कम, लेकिन रहता ज़रूर है।"


फिर कहने लगीं —

"ये सब मोबाइल के कारण हो गया है। जब से मोबाइल आया है, तब से ज़्यादा हो गया है।"


आंटी की बात सुनकर मेरे मन में एक ही सवाल उठा—

"कहाँ जा रहे हैं मेरे नौनिहाल?"





Comments

Popular posts from this blog

समय की कीमत : लघुकथा

कम्पनी : लघुकथा

घास : लघुकथा