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धुआं : लघुकथा

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AI Image शमीमा हुसैन वह एक बहुत खूबसूरत लड़की थी। उसकी अम्मा के पास बहुत ज़मीन थी, बाप सरकारी टीचर था। पर अम्मा को दस कट्ठा ज़मीन से संतोष नहीं था। वह सालों-साल पैसे बचाकर ज़मीन खरीदती रही। चार साल में दो कट्ठा ज़मीन तो ज़रूर खरीद लेती थी। पूरा ध्यान इस बात पर रहता था कि कैसे और ज़मीन खरीदी जाए और पैसे कैसे बचाए जाएं। इसी बचत में ही उसने दो बेटियों की शादी भी कर दी। अब तीसरी और सबसे छोटी बेटी मुनव्वर की शादी की बात चल रही थी। दो-तीन लड़कों से रिश्ता आया। एक लड़का बैंक में काम करता था, मगर उसके माँ-बाप को मोटा दहेज चाहिए था। बात वहीं खत्म हो गई। दूसरा लड़का जिला प्रखंड कार्यालय में काम करता था, लेकिन उसकी भी दहेज की माँग थी। ऐसा नहीं कि अम्मा के पास पैसे नहीं थे— खेत के लिए पैसा बचाकर रखा था। खेत बेटा के लिए खरीदना ज़रूरी था, लेकिन बेटी की शादी बिना दहेज हो जाए, यही चाह थी। उधर रिश्तेदारी में एक फूफी के बेटे की पहली शादी एक साल में ही टूट गई थी— उसकी बीवी भाग गई थी। अब वह दूसरी बार शादी के लिए लड़की ढूँढ रहा था। एक दिन अम्मा खेत के लिए बीज खरीदने मेला गई। वहीं उसे दूर की वही फूफी मिली। ...

चाय का कप : लघुकथा

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AI Image -नायला अदा रेहाना की उम्र तो बस पंद्रह बरस थी, पर उसकी आंखों में वक़्त की धूल जमी थी। बचपन उसे छूकर भी नहीं गया था। सुबह की पहली अज़ान के साथ वह उठती, गली-गली के घरों में काम करती — बर्तन, झाड़ू, पोंछा और कभी-कभी चूल्हे की तपिश भी झेलती। उस रोज़ अमजद साहब के घर उसने जल्दी-जल्दी काम निपटाया। उन्हें चाय बनाकर कमरे में ले जा ही रही थी कि हाथ काँप गया। कप ज़मीन पर गिरा — और जैसे ही गिरा, सन्नाटा टूट गया। "अरे हरामखोरी की हद है! तमीज़ नहीं है चाय देने की?" अमजद की आवाज़ में जहर था। रेहाना ने सिर झुका लिया, "गलती हो गई, साहब..." लेकिन माफी मांगने से पहले ही एक झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। अमजद की बीवी ने थप्पड़ों से अपना गुस्सा उतारा, और फिर दोनों ने उसे पीट-पीटकर जैसे अपनी हैसियत जताई। रेहाना के फटे दुपट्टे और सूजे गालों के बीच, उसकी चुप आंखें कुछ बोल गईं — दर्द की जुबान दुनिया को अक्सर देर से समझ आती है। मगर मोहल्ले की औरतों ने देखा, सुना... बात एक समाजसेवी तक पहुँची। केस दर्ज हुआ। और एक दिन वही अमजद अदालत की चौखट पर खड़ा था — शर्मिंदा, लेकिन देर स...

खाड़ी का आईना : लघुकथा

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AI Image -शमीमा हुसैन  पानी साफ था। इतना साफ कि अपना चेहरा थोड़ा झुकाकर आईने की तरह देखा जा सकता था। मैं पानी देखकर हैरान हो गई—एक तरफ इतना प्रदूषण और दूसरी तरफ इतनी सफाई! एक लंबी खाड़ी के सामने मैं खड़ी थी। पानी चांदी की तरह चमक रहा था। हम थोड़ी दूरी पर थे, जहां कबूतरों की बारात लगी हुई थी। किसी ने राजमा और गेहूं बिखेर दिया था। कबूतर बड़े ही प्यार से गेहूं खा रहे थे। कबूतरों के झुंड से थोड़ी दूर एक सफेद चिड़ियों का झुंड था। सारी चिड़ियाँ चांदी के वर्क जैसी लग रही थीं। हवा तेज नहीं थी, लेकिन खाड़ी की थोड़ी-सी हवा भी बहुत ज़्यादा लग रही थी। मेरे बाल खुले हुए थे। हवा मेरे बालों से खेलने लगी। बाल मेरे चेहरे और आंखों में उड़ने लगे। मैं उस पल के जादू में खो गई। ऐसे ही नज़ारे दूर तक फैले थे। मैं चलती गई। चलते-चलते प्यास लग गई। कई लोग पानी बेच रहे थे। एक महिला भी पानी बेच रही थी। पानी, कबूतर, हवा के साथ-साथ मैं और भी बहुत कुछ देख रही थी। वह पानी वाली बड़े ही मीठे स्वर में गा रही थी — "ठंडा-ठंडा बिसलेरी पियो..." वह मेरे पास दो-तीन बार होकर गई। मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई — "आंटी! प...

कहानी : नदी के किनारे

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AI ART कहानी : नायला अदा फरहत लंबे बालों वाली लड़की थी। वह चलती तो लोग उसके लंबे लहराते बालों की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे। वह थी तो बहुत सीधी-सादी, लेकिन पढ़ने में तेज़ तर्रार। उसका गाँव अल्ताफपुर हरियाली और परंपराओं के लिए जाना जाता था। वहीं से लगे हुए एक दूसरे गाँव नूरपुर में रहता था एहसान खान। वह लंबा और गोरा युवक था। वह जब मोटरसाइकिल पर कॉलेज जाता तो लड़कियों की नज़रें उसी पर टिकी रहतीं। फरहत और एहसान की पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई थी, जब दोनों एक ही किताब के लिए हाथ बढ़ा बैठे थे – “अकबर और बीरबल की कहानियाँ।” दोनों झिझकते हुए मुस्कराए और किताब  साथ-साथ पढ़ने लगे। धीरे-धीरे मुलाकातें चाय की दुकानों, लाइब्रेरी के कोनों और कॉलेज के बागों में बदलने लगीं। एहसान की बातें मीठी थीं, और फरहत की आँखों में सपनों का समुंदर। बारिशों के दिन थे। पेड़ों के नीचे दोनों छाते की छांव में भीगते हुए भी बातों में खोए रहते। एहसान ने एक दिन फरहत का हाथ थामकर कहा, "तू जो कहेगी, वही करूंगा ज़िंदगी में। मैं सिर्फ़ तेरा हूँ।" फरहत की आँखें भीग गईं। शायद बारिश से, शायद एहसान के वादो...

कहानी : रील के बाद

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कहानी : नायला अदा AI art उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में, एक पुराना सा, खपरैल वाली छत का मकान था—न सफेद, न काला, बस वक्त की गर्द से रंगहीन। इसी घर में रहती थी नज्मा, एक पचपन की उम्र पार कर चुकी विधवा, जिसने जीवन की सारी चुनौतियों को अपने हाथ की सुई और धागे से सीकर झेला था। पति की मौत के बाद वह टूटी नहीं, बल्कि और मजबूत हो गई। अकेली औरत, दो बेटियों की मां—कोई सहारा नहीं, बस उम्मीद और हुनर। नज्मा का पूरा दिन सिलाई मशीन के आगे गुजरता था। वो सुबह की नमाज़ के बाद अपनी मशीन पर बैठती और देर रात तक लोगों के कपड़े सिलती रहती। कभी सलवार-कुर्ते, तो कभी स्कूल यूनिफॉर्म। उसी से दो वक्त की रोटी और बेटियों की फीस निकलती थी। बड़ी बेटी रौनक बारहवीं में थी। सुंदर, आत्मविश्वासी और नयी दुनिया से बेहद आकर्षित। उसे मोबाइल पर रील बनाना पसंद था। वो अपनी सहेलियों के साथ स्कूल की यूनिफॉर्म में गाने पर लिप्सिंक करती, कभी डांस, कभी एक्टिंग। घर में वह मोबाइल स्टैंड पर मोबाइल रखती और रूमाल को घूंघट की तरह ओढ़कर डायलॉग बोलती—“मुझे हीरोइन बनना है अम्मी।” नज्मा पहले तो हँस देती, मगर धीरे-धीरे डरने लगी। दुनिया देख...

गुलज़ार हुसैन के तीन कविता-पोस्टर

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  हिन्दवी ने बनाया है यह पोस्टर। हौसला वेबसाइट का बनाया पोस्टर। गुलजार हुसैन के काव्य संग्रह से एक कविता का अंश। झपसी ब्लॉग पर गुलज़ार हुसैन की कविताओं के तीन पोस्टर

सुनो लड़कियों : गुलज़ार हुसैन की एक कविता

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Artist : Gulzar Hussain सुनो, भ्रूण हत्या के आतंक का शिकार होने से बची लड़कियों सुनो कि यह समय निश्चिंत होकर बैठने का नहीं है यह समय बेहद सतर्क रहने का है क्योंकि गिद्ध अब भी मंडरा रहे हैं ये वही गिद्ध हैं जो तुम्हारे जिस्म को तुम्हारी मां के गर्भ में ही नोचना चाहते थे और अब ये तुम्हारे बचपन की अल्हड़ता पर नजरें गड़ाए हैं सुनो, युवा होती लड़कियों गिद्ध कहीं दूर नहीं गया है वह घर के बाहर भी हो सकता है और घर के अंदर भी तुम्हें डरा सकता है वह कार के अंदर से तुम्हें घूर सकता है और सडक किनारे से फब्तियां कस सकता है सुनो लड़कियों वह गिद्ध तुम्हें शादी से पहले एक दोस्त के रूप में मिल सकता है और प्रेमी के रूप में भी तुम्हें चोट पहुंचा सकता है वही गिद्ध तुम्हें शादी के बाद पति के रूप में मिल सकता है और दहेज के लिए तुम्हें जलाने की साजिश भी रच सकता है इसलिए, सुनो लड़कियों ऐसे गिद्ध पुरुषों को धक्के देकर आगे बढ़ जाओ -गुलज़ार हुसैन