पहला दिन : लघुकथा
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शमीमा हुसैन
पति है, उसका हक़ है कि वह मारे, गाली दे, लान-तान करे—सब सही है। यही कहती हैं “अम्माजी”। इस सोच से मर्दों का हौसला और बढ़ जाता है। पति है, वह बड़ा है, स्वामी है—सब बातें ठीक हैं।
लेकिन वह करता क्या है?
हर दिन अरीना को मारता है। पिछले महीने जून में भी मारा, मारकर बिज़नेस टूर पर चला गया। हर बार यही करता है। घर पर जब रहता है, तब अरीना का जीना हराम हो जाता है।
अरीना कहती है, बताती है—
“शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है जिस पर इस आदमी की मार न पड़ी हो, और मन का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है जो घायल न हुआ हो। बस अपने बच्चे के लिए सब सह रही हूँ।”
“कितना सहन करोगी? छोड़ दो, अलग हो जाओ”—कुछ लोग ऐसा कहते हैं।
पर कुछ लोग यह भी पूछते हैं—“क्यों मारता है?”
लोगों को सब पता होता है, लेकिन असल दर्द वही जानता है जिस पर मुसीबत आती है। जब पति जालिम होता है, तो मारने की कोई वजह नहीं होती।
बस—अभी तक रेडी क्यों नहीं हुई, खाना अभी क्यों पका रही हो, इतनी रोटी क्यों बच गई, आज मैंने गोभी बोला था तो भिंडी क्यों बनाई?
यही सब वजहें होती हैं।
एक दिन हद हो गई। वह मार रहा था और गालियाँ बक रहा था। अरीना का बेटा यह सब देख रहा था। बच्चा पूरी तरह सहम गया। रात में उसे तेज़ बुखार हो गया। डॉक्टर ने कहा—बच्चा बहुत डर में है।
तब अरीना ने तय कर लिया—अब इसके साथ नहीं रहना है।
उसने हिम्मत की और वह घर छोड़कर निकल गई।
आज बच्चा सेटल है, लेकिन उस दिन को याद करके आज भी मन दुख से भर जाता है। घर छोड़ने के बाद पति ने उसके चरित्र पर आरोप लगाए।
मर्दों का फार्मूला है—जब औरत मार खाने और जुल्म सहने से इनकार करती है, तो मर्द उसे एक ही नाम देता है—“छिनाल”।
उसी पर भी यही आरोप लगाया गया।
लेकिन अब उसे एक बात का एहसास शिद्दत से हो रहा है—
पहले ही दिन मार खाने से इनकार कर देना चाहिए था।
पहले ही दिन बात को सार्वजनिक कर देना चाहिए था।
पहले ही दिन इस ज़ुल्म को रोक देना चाहिए था।

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