पहचान : लघुकथा
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-शमीमा बानो
मासूम बहुत सालों की कोशिश के बाद यूके जा सका था। उसने बहुत मेहनत से पढ़ाई की, डिग्रियाँ जमा कीं और साहपुर के कॉलेज में लेक्चरर लग गया। माँ-बाबा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। बेटा भी खुश था, लेकिन उसकी खुशी के भीतर एक कसक लगी हुई थी। उसका मन था कि यूके के किसी कॉलेज में लेक्चरर बन जाए।
वह साहपुर के कॉलेज में प्रोफेसर हो गया था। दिन-रात कोशिश कर रहा था कि यूके के कॉलेज में चयन हो जाए। उसने पीएचडी की थी और अपने विषय पर उसकी गहरी पकड़ थी। फिजिक्स उसका फेवरेट सब्जेक्ट था और साहपुर कॉलेज में भी वह फिजिक्स का ही लेक्चरर था। आखिरकार मासूम की कोशिश सफल हो गई—यूके के एक कॉलेज में उसका चयन हो गया।
अब सवाल था—जाने के लिए वीज़ा और पासपोर्ट का, और उसके लिए पैसे चाहिए थे।
मासूम ने अब्बा से कहा,
“अब्बा, मेरा सेलेक्शन हो गया है। पासपोर्ट बनवाने के लिए पैसे चाहिए।”
अब्बा पहले से ही उसके जाने के खिलाफ थे। उनका मन था कि बेटा उनके पास रहे, शादी करे और यहीं सेटल हो जाए। उनका विचार था कि अपनी ही मिट्टी में रहना चाहिए। माँ को छोड़कर जाना वे गुनाह समझते थे। अब्बा ने साफ मना कर दिया।
मासूम की आँखों के सामने एक ही रास्ता था। उसने कहा,
“अब्बा, ज़मीन बेच दीजिए। मैं कमा कर फिर से खरीद लूँगा।”
यह सुनकर अब्बा दुखी हो गए और बोले,
“थोड़ी-सी ज़मीन है, उस पर भी ऐसी बात कर रहा है?”
मासूम की अम्मा बेटे के साथ थीं। रोज़-रोज़ की किच-किच शुरू हो गई—
“ज़मीन बेच दो और मासूम को पैसे दे दो।”
मासूम मुँह फुलाए बैठा रहता। आखिरकार अब्बा हार गए और बेटे की बात मान ली। ज़मीन बेचकर पैसा दे दिया। मासूम यूके चला गया। वहाँ से खूब कमाने लगा और पैसा भेजता रहा। घर बन गया, ज़मीन भी दोबारा हो गई।
तीन साल का टर्म पूरा होने के बाद मासूम घर आया। उसकी शादी हो गई। छुट्टी खत्म हुई और वह वापस चला गया। हर छुट्टी में वह आता रहा। बच्चा भी हो गया। पैसा वह अब्बा को ही भेजता रहा।
बीबी ने सवाल उठाया—
“पैसा मुझे चाहिए।”
मासूम ने अब्बा से कहा,
“कुछ पैसा रिदा के जेब खर्च के लिए हर महीने दे दीजिए।”
अब्बा मान गए और हर महीने रिदा को पैसे देने लगे। लेकिन रिदा खुश नहीं थी। उसका कहना था,
“मुझे अलग रहना है। मैं मायके में रहूँगी। हमें अपने माँ-बाप के साथ रहना है। वहीं पैसा भेजो।”
अब्बा घर चलाते थे, सालों से वही व्यवस्था थी। दोनों में रोज़ बहस होने लगी। रिदा अम्मा-अब्बा की शिकायत करती रहती। कभी उन्हें सही नहीं बताती। कहती,
“मेरे बच्चों को तकलीफ है, मुझे बहुत दुख है।”
इस बार जब मासूम घर आया तो रिदा रोज़ झगड़ा करने लगी। मासूम हर बार समझाता, लेकिन वह समझने को तैयार नहीं थी। एक दिन उसने हद कर दी—चूहा मारने की दवा घोलकर पीने जा रही थी।
अब मासूम का सब्र टूट गया। उसने कहा,
“ठीक है, मायके में ही रहो। अब पैसा वहीं भेजूँगा।”
आज ईद का दिन है। सुबह अब्बा के साथ प्याला पिया। शाम का खाना बीबी और बच्चों के साथ है। आज मासूम के कलेजे में कुछ कट रहा है। वह सोच रहा है—बच्चे हर वक्त नाना-मामा का नाम लेते हैं। ददिहाल से उनकी कोई पहचान ही नहीं है।

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