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Showing posts from 2023

समय की कीमत : लघुकथा

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AI IMAGE  -शमीमा  हुसैन   आज जुमा का दिन था, लेकिन सुल्ताना का मन सुबह से ही भारी था। वह धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाली स्त्री थी। फज्र की नमाज़ से लेकर रात ईशा तक उसका दिन मशीन की तरह चलता। ईशा की नमाज़ अदा करने के बाद वह इतनी थक जाती कि कई बार पानी पीने का भी होश नहीं रहता। सुल्ताना की तीन बहुएँ थीं। स्वभाव तीनों के अलग थे, पर आँगन एक ही था। घर भी एक ही आँगन में बने थे। सुल्ताना की दिली ख्वाहिश थी कि तीनों बहुएँ मिल-जुलकर रहें, एक साथ परिवार बनाकर। लेकिन बहुओं ने साफ़ कह दिया—वे इकट्ठा नहीं रह सकतीं। सुल्ताना ने ज़्यादा विरोध नहीं किया। उम्र के साथ वह यह समझ चुकी थी कि रिश्तों को ज़ोर से नहीं बाँधा जा सकता। तीनों अलग हो गईं। अब सवाल खड़ा हुआ—सुल्ताना कहाँ रहेगी? छोटे बेटे ने कहा, “अम्मी, आप मेरे साथ रहिए।” पर सुल्ताना ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। तीन दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया। मन ही मन वह टूटती रही। तीन दिन बाद उसने तीनों बेटों और बहुओं को बुलाया और एक बार फिर साथ रहने की बात समझाई, मगर कोई तैयार नहीं हुआ। आख़िरकार सुल्ताना ने फ़ैसला सुनाया— “म...

शमीमा हुसैन की लघुकथा : गुरुवार बाजार

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मुंबई के बाजार का फोटो। आज गुरुवार है। रहीमा तैयार होकर अपनी सहेली ममता के घर जाती है और कहती है, 'आज तो काजूपाड़ा में गुरुवार बाजार लगा है। चलो चलें।' ममता फीकी मुस्कान के साथ कहती है, 'सुनो न, रहीमा। मेरे जो पैसा था, वह तो आई को दे दिया। राशन भरना था। अब खाली हाथ बाजार जाने का मन नहीं करता।' दोनों एक साथ ही सब जगह जाती थी। कभी दोनों का कपड़ा एक ही तरह का होता, तो कभी मेकअप भी एक ही तरह का होता था। अक्सर लोग दोनों को जुड़वा बहनें समझने की भूल कर बैठते।  ममता की बात सुनकर रहीमा कहती है, 'अरे चलो न।'  ममता आईना के सामने बाल संवारने लगी। जब मेकअप पूरा हो गया, तो ममता ने कहा, 'चलो रहीमा चलें।' रहीमा स्टूल से उठकर खड़ी हो गई और ममता के चेहरे का मेकअप देखने लगी। उसने हैरानी से पूछा, 'अरे, लिपस्टिक दूसरे कलर का क्यों?'  ममता हंसने लगी। उसे देखकर रहीमा भी हंसने लगी। हंसते-खिलखिलाते हुए ही दोनों बाहर निकल गईं। कुछ सालों से दोनों एक साथ ही बाजार जाती हैं। गुरुवार बाजार में खूब रौनक होती है। बाजार की खूबसूरती बढ़ जाती है। यानी गुरुवार को बाजार बसंत ऋतु जैस...

दो कविताएं : ठहरो, अभी युद्ध की घोषणा मत करो

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ठहरो, अभी युद्ध की घोषणा मत करो जरा ठहरो, अभी युद्ध की घोषणा मत करो ओ सभ्य कहलाने वाले देशों के जहांपनाहों, अभी रुक जाओ ओ बम गिराने वाले देश के कथित रक्षकों, अभी रुक जाओ ओ बदला लेने के लिए बेचैन देश के निर्णायकों, अभी रोक लो कदम क्योंकि अभी भी तुम्हारे कदम के नीचे पैर रखने के लिए हरी-भरी जमीन है क्योंकि अभी भी सांस लेने के लिए बह रही है शीतल हवा निरंतर ठहर जाओ ओ हिंसा के दूतों क्योंकि अभी कुछ दिन पहले ही तो तुम सभी के मुल्क में पैदा हुए हैं नन्हे बच्चे ठीक वैसे ही जैसे अभी कुछ महीने पहले ही हमारे पड़ोस में एक बच्ची ने लिया है जन्म ओ धरती को रक्तरंजित करने को आतुर शिकारियों युद्ध की घोषणा करने से पहले जरा अपने-अपने देश में पैदा हुए बच्चे के चेहरे की ओर तो देख लो जैसे मैं देखता हूं हमारे पड़ोसी के घर में अभी कुछ दिन पहले ही जन्म ले चुकी मासूम बच्ची के चेहरे की ओर जब भी देखता हूं उस नन्ही परी को अपलक वह मुझे देख मुस्कुरा देती है ...वह खिलखिलाने लगती है उसकी उस निश्छल हंसी को देख मैं न जाने कैसी चमत्कारी शक्तियों का स्वामी बन जाता हूं और आकाश की ओर देखकर सूरज को अपनी तपिश को कम करने का हुक...

...जब महात्मा गांधी को जला देने को आतुर थी भीड़

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हां, इस पुस्तक (दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास) को पढ़कर ही मैं यह जान पाया था कि दक्षिण अफ्रीका में उग्र भीड़ उन्हें जला देने को आतुर थी।  इस मुद्दे पर बाद में आता हूं, पहले तो यह बता दूं कि महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का जो व्यक्तित्व दक्षिण अफ्रीका में उभर रहा था, वह तो उनकी उस छवि से बिल्कुल अगल था, जो बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेने वाले गांधी की रही है।  दक्षिण अफ्रीका वाले गांधी अहिंसा के रास्ते पर तो अडिग थे, मगर एक फर्क मैंने पुस्तक पढ़ते हुए नोटिस किया था। वहां पर मजदूरों को न्याय दिलाने की उनकी न्यायप्रिय आक्रामकता और जूझारूपन किसी फिल्मी सुपर हीरो जैसी थी। वे विनम्र होने के बावजूद बिल्कुल तीव्रता से मुखर होते थे और सबसे आगे बढ़कर अपनी बात कहते थे। या शायद वहां की परिस्थितियां ही इस तरह की थी कि गांधी आक्रामक रही होगी, जिसके कारण गांधी उस समय जुल्म का विरोध करते किसी अधीर नायक की तरह दिखाई देते थे। किताब पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि सताए हुए लोगों को वे जल्द न्याय दिलाने को अग्रसर हैं। गिरमिटिया मजदूरों पर हुए जुल्म के विरोध में...

घोसी उपचुनाव में सपा आगे, क्या होगा दल बदल कर बीजेपी में गए दारा सिंह का?

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घोसी विधानसभा उपचुनाव का नतीजा लगातार चौंका रहा है। चौथे राउंड की गिनती में सपा के सुधाकर सिंह 4 हजार से ज्यादा वोटों से आगे चल रहे हैं। दारा सिंह चौहान पीछे हो गए हैं।  घोसी विधानसभा उपचुनाव की काउंटिंग सुबह आठ बजे से शुरू गई। गौरतलब है कि मतगणना को लेकर तैयारियां जिला प्रशासन की तरफ से गुरुवार को पूरी कर ली गई थी। कलेक्ट्रेट परिसर में वोटों की गिनती जारी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सपा विधायक का पद छोड़कर भाजपा से विधायक बनने चले दारा सिंह चौहान विधानसभा उपचुनाव जीतेंगे या सपा के सुधाकर सिंह उन्हें पछाड़ देंगे। 

सत्यवादी सुकरात, जिस पर था युवाओं को बहकाने का आरोप

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फोटो : सोशल मीडिया से साभार आज उसे लोग यूनान का महान दार्शनिक मानते हैं, लेकिन जब वह जीवित था तो उस पर तमाम तरह के आरोप लगाए गए और उसे जहर का प्याला पिला दिया गया। हां, वह सुकरात ही थे, जिन पर आरोप था कि वह नास्तिक थे और युवाओं को बिगाड़ रहे थे। 469 ईसा पूर्व में एथेंस में एक गरीब घर में पैदा हुए सुकरात का दर्शन इतना सटीक था कि लोग आज भी उन्हें याद करते हुए उत्साह से भर जाते हैं। उनके पिता संगतराश थे और उनकी मां दाई का काम किया करती थीं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह कभी चुप नहीं बैठते थे और सड़कों पर भटकते हुए लोगों को सत्य की राह दिखाते रहते थे। उनके सत्यवादी होने से वहां के लोग जागरूक हो रहे थे और अपने अधिकारों को लेकर सचेत हो रहे थे। यही बात तत्कालीन सत्ताधारियों को नागवार गुजर रही थी। सुकरात ने कभी कोई ग्रंथ नहीं लिखा था, लेकिन उनके उपदेश देने का तरीका ही इतना प्रभावशाली था कि लोग उन्हें सुनते ही रह जाते थे। वह सूफियों की तरह साधारण लोगों से रूबरू होते थे। सुकरात बहुत ईमानदार और दृढ़ संकल्प वाले विचारक थे। वह उपदेश देने के लिए बहुत सुबह ही अपने घर से बाहर निकल जाते थे और लोगों क...

कर्नाटक में जीत के बाद क्या 2024 में भी मोहब्बत की दुकान सजा पाएंगे राहुल गांधी?

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 Image source : twitter 'भारत जोड़ो यात्रा' का असर क्या आगामी लोकसभा चुनाव में भी दिखाई देगा कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद लोगों के मन में सबसे पहला सवाल यही उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी 2024 के लोकसभा चुनाव में अपना यही दमखम बरकरार रख पाएंगे। कई राजनीतिक विश्लेषक यह मान कर चल रहे हैं कि कर्नाटक की शानदार जीत राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की सफलता का ही परिणाम है। यह सच है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद से ही कांग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त उत्साह देखा जा रहा है। निस्संदेह यही उत्साह और जोश ही कर्नाटक के चुनाव प्रचार के दौरान भी दिखाई दिया। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित सभी बड़े-छोटे नेताओं ने कर्नाटक चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी, लेकिन दूसरी ओर बीजेपी की तरफ से जोरदार चुनाव प्रचार किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद स्टार चुनाव प्रचारक की भूमिका में उतर गए थे और सभी कार्यकर्ताओं में जोश भरते नजर आ रहे थे। कांग्रेस की तरफ से बजरंग दल को बैन किए जाने के मुद्दे को भी स्वयं मोदी ने लपक लिया और उसे बजरंग बली के अप...

अनोखा कलाकार

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कलाकार की एक मुद्रा/Photo:   Gulzar Hussain     आज इस कलाकर को देखा तो मेरे कदम ठहर गए... यह नौजवान मूर्ति की तरह स्थिर था। मानो सांस भी न ले रहा हो। चेहरे पर कोई भाव नहीं ...न दुख ...न सुख ...न उल्लास ...न जिज्ञासा... यह कलाकार (statue artist) निस्संदेह कुशल अभिनेता है, जो चेहरे का हर भाव छिपा कर स्टेच्यू बना रहा, लेकिन इसके बावजूद एक भाव है, जो वह नहीं छुपा पाया। जरा सोचिए कि वह क्या है, जो वह नहीं छुपा सका? ऐ कलाकार, तुम भविष्य में अपनी कला से खूब नाम कमाओ। यही कामना है। (मुंबई में 30 जनवरी को यह तस्वीर ली) -गुलजार हुसैन की फेसबुक पोस्ट 

लघुकथा: ओवन

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Photo: Gulzar Hussain लघुकथा: शमीमा हुसैन आज बच्चों के टिफिन में, फिर से पराठा जैम रखा गया था। स्कूल से दोनों बहनें आ गई थीं। अब आप सवाल करेंगे कौन दोनों बहन? जुलेखा के बेटी है नाजिया और साजिया। दोनों बहनें एक ही चीज को ही पसंद करती थी। एक ही तरह का खाना ...एक ही तरह का कपड़ा। दोनों का हर काम एक ही तरह का होता था। उस दिन जुलेखा टिफिन धोने के लिए खोली तो देखा, दोनों के ही टिफिन में पराठा, जैम जस की तस पड़ी थी। जुलेखा ने जोर से आवाज दी, ''साजिया, नाजिया दोनों इधर आओ।'' ''...आई ममा।'' कहती हुई साजिया दौड़कर आई और पूछा, ''क्या हुआ ममा?'' ''नाजिया कहां है?'' गुस्से में मां ने पूछा। ''ममा, आपी दुकान गई हैं।'' साजिया ने सहमते हुए जवाब दिया। ममी ने चेहरे पर लटक आए बालों को एक तरफ सरकाते हुए कहा, ''सुन लो, आज तुम दोनों को अच्छे से पीटूंगी। ये टिफिन की बर्बादी अब सहा नहीं जाता...तुम दोनों को कुछ समझ में आता भी है कि नहीं।'' तभी ऐन समय पर दादी आ गई और साजिया पिटाई खाने से बच गई। मां के सामने दोनों बच्च...

सौमित्र चटर्जी, जिनकी फिल्में बार-बार देखने का मन करता है

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अपूर संसार में उनका ऐसा दिल को छू लेने वाला अभिनय है कि कोई उसकी जगह पर कोई दूसरा अभिनेता का नाम लेने को कहे, तो मुझसे किसी का नाम न लिया जाए। यहां, उनकी आंखों में एक खालीपन है, वे अपनी पत्नी की तरफ अपलक निहारते हैं। उफ़्फ़। एक दृश्य में वे पूछते हैं- ‘..तोमार चोखे की आछे बोलो तो ?’ एक-एक संवाद को इतनी संजीदगी से कोई कैसे जी सकता है भला। यह तो एकदम जादुई अभिनय है। इसी फिल्म में बाद में अपने नन्हे बेटे के साथ उनका संवाद तो इतना भावुक बन पड़ा है कि पूछिए मत। इस समय मैं जब भी जरा ठहर कर यह सोचता हूं कि भारतीय फिल्मों का कौन सा ऐसा अभिनेता है, जिसका अभिनय मेरे दिल को छू लेता है ...जिसकी फिल्में अब भी शिद्दत से देखने का मन करता है, तो वह नाम है सौमित्र चटर्जी का। इस नाम के सामने मैं न जाने क्यों हिंदी और कुछेक हॉलीवुड फिल्मों के दिग्गज अभिनेताओं के नाम भूल-सा जाता हूं। मैं अपने बाबा को आज भी शुक्रिया कहना चाहता हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में टीवी पर सौमित्र चटर्जी की बेहतरीन फिल्में देखने की छूट दी। बाद में बड़े होने पर मैंने फिर से उनकी फिल्मों को कई बार देखा। सत्यजीत रे के निर्देशन में बनी क...