किराएदार : लघुकथा
शमीमा हुसैन
एक शहरी अफसर का तबादला एक छोटे से कस्बे में हो गया। साहब ने अपनी पावर का पूरा उपयोग किया ताकि तबादला रुक जाए, पर साहब की पावर विफल हो गई। तबादले के बाद साहब को घर खोजना था। कई मकानों को देखने के बाद साहब को एक मकान पसंद आया। मकान अच्छा था, बड़ा भी था। लेकिन मकान मालकिन के तेवर-गेवर कुछ अलग ही थे। वह भाड़ा ज्यादा बोल रही थी, और समय से पहले ही भाड़ा उसे चाहिए था। यह बात साहब को बहुत अखर रहा था।
साहब ने सोच लिया कि इसे कोई बहाना देकर दूसरे मकान को खोज लूंगा। भाड़ा भी कम नहीं कर रही है। मकान के साथ में एक सटा हुआ बगीचा था। छोटा था, पर उसमें तरकारी, अमरूद, पपीता और एलोवेरा के पेड़ थे।
साहब ने सवाल किया, "यह बगीचा किसका है?"
मकान मालकिन ने कहा, "मेरा है। जिसको भाड़े पर मकान देती हूं, किरायेदार ही बगीचे की देखभाल करता है और फल-सब्जी भी किरायेदार खाता है।"
साहब के पैर में कई सालों से दाद-खाज था। बहुत इलाज कराया, पर ठीक नहीं हो रहा था। एक हकीम साहब ने कहा था, "एलोवेरा के ताजा गूदा निकालकर दाद पर लगाएं।"
साहब की नीयत बदल गई। भाड़ा ज्यादा है, पर एलोवेरा की दवा मिल रही है। साहब ने कहा, "कल मैं अपना सामान लेकर आता हूं।"
अगले दिन साहब का सामान आया और परिवार भी आया। बगीचा देखकर उनकी दोनों बेटियां बहुत खुश हुईं। लगभग आठ-दस महीने तक एलोवेरा लगाने के बाद साहब की बीमारी ठीक हो गई।
साल गुजरने के बाद साहब की बीबी ने कहा, "इस मकान का किराया ज्यादा है। आपकी बीमारी भी ठीक हो गई है। क्या दूसरा मकान देखना चाहिए?"
अफसर साहब ने दूसरा घर देखना शुरू कर दिया। कई मकानों को देखने के बाद भी अच्छा मकान नहीं मिला।
एक दिन वह भाड़ा देने गया। मकान मालकिन नहीं थी। अम्मा (मालकिन की सास) मिलीं। अम्मा ने कहा, "बेटा, हमारा बेटा कोरोना में चला गया। तब से भाड़े से ही हमारी बहू घर चलाती हैं। इस इलाके में किरायेदार जल्दी नहीं मिलता।"
साहब ने जब सुना कि मालकिन विधवा है, तो साहब को झटका लगा। थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, "अम्मा, मैं दूसरा मकान खोज रहा हूं।"
अम्मा ने उदास होकर कहा, "आप की बहुत मेहरबानी होगी कि आप इस मकान को नहीं छोड़ें।"
साहब ने कहा, "नहीं, अब मेरा इरादा बदल गया है।"
साहब रास्ते भर यही सोचता रहा कि तबादला होगा तब इस मकान से चला जाऊंगा। इस तरह उनकी मदद हो जाएगी।

Comments
Post a Comment