जकीना की 'लाली' : लघुकथा
शमीमा हुसैन
जकीना! अरे जकीना, लाली को मार मत पिलाना।
जकीना की अम्मा हाथ में खुरपी और बोरा लेकर दरवाज़े के बाहर निकलते हुए उसे समझा रही थी। माघ का महीना था। जकीना के पास चार बकरियाँ थीं—चितकबरी, लाली, पीली और एक और।
माघ का महीना गरीबों और बूढ़ों के लिए बहुत दुःख का महीना होता है, यह बात सब जानते हैं। पर लाली और फागी भैंस जैसी मवेशियों की तकलीफ़ की बात कोई नहीं करता।
इसी बीच जकीना की बकरी “लाली” कई दिनों से बीमार थी। आज तो उसका मुँह भी सूजा हुआ था। लाली के दो छोटे बच्चे थे, दोनों अब भी दूध पीते थे। वे अभी बहुत छोटे थे। सारी बकरियों की देखभाल जकीना ही करती थी।
जकीना के दो भाई थे, लेकिन वे कभी बकरी को हाथ तक नहीं लगाते थे। अब्बा कभी-कभार मदद कर देते थे। कहीं कटहल का पत्ता दिख गया, तो माँगकर ले आते थे। घर की बकरियों की पूरी जिम्मेदारी जकीना ही उठाती थी। हाड़ तोड़ ठंड में भी, कुहासा थोड़ा कम होते ही, शाल-स्वेटर पहने, वह बकरियों को नहर किनारे चराने ले जाती थी।
जकीना अपनी बकरियों का बहुत ध्यान रखती थी। लेकिन माघ का महीना! बड़े-बड़े मवेशियों की हालत खराब हो जाती है। न जाने लाली को कैसे ठंड लग गई? पोरा सुखाकर विछावन करते हैं, ओढ़ना बाँधते हैं—फिर भी बेचारी लाली को ठंड लग ही गई।
जकीना सोच रही थी—“कल अम्मा से कहूँगी चीनी-चायपत्ती ला दें, मैं लाली को काली चाय बनाकर पिला दूँगी।”
जकीना का अपना सुख-दुख सब बकरियों में ही था। एक महीना पहले ही एक खस्सी बिका था। उसी पैसे से घर के सामने का गिरता हुआ छप्पर बनवाया गया था। बकरी पालने में बड़ी मेहनत लगती है, लेकिन बरसात और ठंड में मवेशियों का हाल बहुत खराब हो जाता है। अम्मा कहती थी—“इस बार वाली खस्सी बेचकर चावल-गेहूँ भर देंगे।”
इन्हीं सोचों में पता नहीं कब उसकी नींद लग गई।
सुबह नींद खुलते ही जकीना सीधे लाली के पास गई। देखा तो लाली एकदम उदास बैठी है, जुगाली भी नहीं कर रही। अम्मा ने उसे चाय बनाकर पिलाई थी। जकीना जल्दी से चादर ओढ़कर बाहर आँगन में बनी रसोई की तरफ पहुँची, जहाँ सब जमा थे।
वह रुआँसी होकर बोली- “अम्मा, अब क्या होगा? लाली की हालत बहुत खराब है। पागुर भी नहीं कर रही!”
अम्मा उदास होकर बोली, “डॉक्टर को दिखाना होगा।”
जकीना गुस्से में बोल उठी, “जल्दी बुलाइए न! जब लाली मर जाएगी तब बुलाएँगी?”
अम्मा ने अपनी चादर बदली और कहा, “मैं माली टोला जाती हूँ, डॉक्टर पंकज को बुलाकर लाती हूँ।”
डॉक्टर आया और बोला, “बकरी को ठंड लग गई है, निमोनिया हो गया है। कई दिनों से मन मारे बैठी है। शायद छह-सात दिन से। दवा देता हूँ, पहले दिखा देतीं, तो अच्छा होता।”
डॉक्टर ने चार-चार घंटे पर दवा देने को कहा। जकीना ने बिल्कुल समय पर दवा दी, लेकिन दवा का कोई असर नहीं हुआ। अगले दिन लाली मर गई।
जकीना बहुत रोई। रोते-रोते थककर सो गई।
अम्मा सिब्तिया के घर उसे बुलाने गईं। सिब्तिया की बेटी ने पीढ़ा लाकर कहा,“बैठिए मामी।”
अम्मा ने पूछा, “बेटी, तुम्हारी माई कहाँ है?”
बेटी बोली, “मामी, माई कैइथ टोला गई है।”
इतने में सिब्तिया आ गई। जकीना की अम्मा बोलीं—
“हे सिब्तिया दीदी, मेरी बकरी मर गई है। चलो उठा ले चलो।”
सिब्तिया चुपचाप गई और बकरी को उठा कर ले आई।
शाम में जब जकीना की नींद खुली, तो वह भागकर बकरी के घर गई। लाली नहीं थी। वह जोर-जोर से रोने लगी,“अम्मा! लाली कहाँ है?”
अम्मा ने कहा, “जकीना, रोना बंद करो। लाली को सिब्तिया को दे दिया है।”
“क्यों? क्या वह उसे जिंदा कर देगी?”
जकीना फिर रोने लगी।
इतने में उसका भाई हँसते हुए बोला—
“वह तो लाली को भूनकर खाएगी—नमक-मिर्च लगाकर!”
यह सुनकर जकीना और जोर से रोने लगी, “क्यों दे दी मेरी लाली…”
और फूट-फूटकर रोती रही—
“अहह… अहह…”

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