अब चाहे जो हो जाए : लघुकथा
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-शमीमा हुसैन
शाम के चार बज रहे थे। आँगन में धूप की आख़िरी किरणें झुक रही थीं और लुना रसोई में पाँच किलो आटा गूँध रही थी। रोटी और चिकन का सालन बनाना था—सबके लिए, हर दिन की तरह।
आटा गूँधते हुए अचानक उसे कल की बात याद आ गई। अम्मा जी ने ताना मारा था,
“मैं तो कभी लेट नहीं हुई। इसे न जाने कैसे रोज़ लेट हो जाता है?”
यह वाक्य चाकू की तरह उसके भीतर उतर गया था। नुकीला, ठंडा और चुभता हुआ।
लुना की मुट्ठियाँ तन गईं। गुस्सा जैसे भीतर उबलता हुआ लावा हो—हर शब्द, हर ताना, हर दिन की मजबूरी उसे और तीखा कर देते थे।
अपना- पराया का एहसास होता—वह गमला उठाकर ज़ोर से पटक देती है।
धनिया, जीरा, काली मिर्च—जो चिकन के लिए उसने अभी-अभी निकाले थे—सब हवा में उड़ाकर ज़मीन पर बिखेर देती बिखर जाते हैं।
और वह चीखती है,
“मैं अकेली ही क्यों सबका खाना पकाऊँ? सब लोग खाते हैं, तो सबको काम करना चाहिए! आरा मशीन की कमाई से सबका फ़ायदा है, लेकिन मेरा? शादी को दो साल हुए, और मेरी ज़िंदगी उन्होंने कोयले की भट्टी में झोंक दी है!”
कल्पना में ही सही, वह लात-घूँसे से बाल्टियाँ और बर्तन उछाल देती है। पूरे घर में हंगामा मच जाता है—पर यह हंगामा केवल उसके मन की दीवारों से टकराकर लौट आता है।
सच तो यह है कि उसका ग़ुस्सा, उसकी चुप्पी और उसका दर्द—सब कुछ चौबीस कैरेट की सच्चाई थे। पर वह आवाज़ बाहर नहीं निकलती थी, बस भीतर घुमड़कर रह जाती थी।
घर का ढांचा भी बड़ा अलग था। ससुर की आरा मशीन—जहाँ सात आदमी काम करते थे। कुर्सियाँ, मेज़ें, दरवाज़े—सब बनते थे। मगर सभी का भोजन घर में ही तैयार होता था।
सास ने साफ़ कह रखा था—
“अब हमसे काम नहीं होगा, बहुत कर लिया है ज़िंदगी में।”
और ननद दो-तीन महीने के लिए आती, आराम करने।
यह नियम किसने बनाया? किसका कानून था यह?
हर दिन लुना एक ठंडा युद्ध लड़ती थी—बिना आवाज़, बिना हथियार के।
लेकिन एक दिन—वह चुप्पी टूट गई।
उसने सचमुच सब बर्तन पटक दिए। मसाले हवा में उड़ गए। और वह , चिल्लाती, काँपती आवाज़ में बोल उठी—
“सब लोग खाते हैं, तो सब लोग काम करें! अब चाहे जो हो जाए!”
उसके भीतर का मन वर्षों से यही चीख रहा था—आज बस वह बाहर आ गया।

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