पत्ता : लघुकथा

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शमीमा हुसैन


“लाइन के पार नहीं जाना? माई जो कहत उही करिये। सारा दिन गाछी में न घूमिये, बउआ।”

साहबजान अपने बेटे मेंहदीजान को समझाकर सियालदह ट्रेन पकड़कर कलकत्ता चला गया। उस समय मेंहदी की उम्र सिर्फ सात साल थी। साहबजान ईद में घर आता था, साल में दो बार। पूरे साल कड़ी मेहनत करता और पैसा भेजता रहता। घर का खर्च ठीक से चल रहा था।

मेंहदी बहुत प्यारा बच्चा था। माँ की हर बात मानता। माँ के साथ गाछी-गाछी घूमता, उसके कामों में मदद करता। दौड़-दौड़कर पत्ता चुनता, जल्दी-जल्दी बोरे में भरता और सिर पर उठाकर घर लाता।

जब मेंहदी बारह साल का हुआ तो माँ को बहुत आराम हो गया। अब वह अकेले ही गाछी से पत्ता ले आता था। माँ कभी-कभी ही जाती थी। मेंहदी अब समझदार हो गया था। वह माँ से कहता,

“अम्मा, तू पत्ता लाने मत जाओ, हम खुद चुन-बिछ लायेंगे।”

माँ कहती, “हम भी थोड़ा-बहुत पत्ता लायेंगे, बरसात तक जलाने के लिए चाहिए।”

लेकिन मेंहदी की ज़िद के आगे माँ ने पत्ता चुनना छोड़ दिया। अब घर में वही पत्ता जलता जो मेंहदी लाता।

मेंहदी सब कुछ जल्दी सीख गया—साइकिल चलाना, सौदा लाना। होशियार बच्चा निकला। घर में उसकी वजह से रौनक थी। वह समय से पहले बड़ा हो गया। आटा पिसवाना, रजना जाना, पेठिया जाना—सब संभालने लगा। माँ मन ही मन खुश रहती। जब अब्बा का फोन आता तो गर्व से कहती- मेंहदी ये काम किया, वो काम किया।


लेकिन पत्ता बिछाने के साथ-साथ पत्ता खाने की आदत कब लग गई, किसी को पता नहीं चला। बहुत दिनों तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। फिर लोग कहने लगे,

“तुम्हारा लड़का पत्ता खाता है।”

माँ को भरोसा नहीं हुआ। फिर भी उसने पूछा,

“मेंहदी, तू पत्ता खाता है?”

मेंहदी ने साफ-साफ इनकार कर दिया।

माँ ने गौर किया कि पहले वह हर काम के बाद एक-एक रुपया वापस देता था, अब नहीं देता। पूछने पर कहता,

“समोसा खा लिया” या “जलेबी खा ली।”

रोज़ का यही हिसाब हो गया।

एक दिन जब वह पेठिया से लौटा, माँ ने उसके मुँह से गुटखे की महक सूँघ ली। अम्मा चिल्ला पड़ी,

“लोग सही कह रहे थे। हम तुझ पर भरोसा किये थे, तू तो पत्ता-खोर निकल गया!”

उस दिन अम्मा ने बहुत डाँटा, कसम खिलाई, डराया, समझाया।

मेंहदी बोला, “अब नहीं खाऊँगा अम्मा, गुटखा नहीं खाऊँगा।”

कुछ दिन सब ठीक चला। लेकिन आदत इतनी आसान नहीं थी। दुकानों पर चमकीली फुलवा की लड़ियाँ टँगी रहतीं। कदम अपने-आप उधर बढ़ जाते। मेंहदी फिर पत्ता खरीद लेता, खा लेता और जेब में भर लेता।

फिर एक दिन अम्मा को पता चल गया। इस बार गुस्सा ज़्यादा था। दो-चार थप्पड़ भी पड़े। वह नहीं जानती थी कि उसका बेटा गुटखे के रूप में धीमा ज़हर खा रहा है।

जब अम्मा उसे घर से बाहर नहीं जाने देती, तो मेंहदी का मन विद्रोही होने लगता। सिर दर्द, हाथ-पैर में झुनझुनी, उलटी-सा मन। रात होते-होते किसी बहाने घर से निकल जाता और गुटखा खा लेता। तब जाकर शरीर को सुकून मिलता।

समय बीतता गया। मेंहदी काम करने लगा। दाढ़ी-मूँछ आ गई, कद बढ़ गया, लेकिन आदत नहीं बदली।

जैसे घर के लिए खंभा ज़रूरी होता है, वैसे ही आदतें जीवन का खंभा होती हैं। मेंहदी का खंभा ही कमज़ोर था।

कुछ दिनों से कान में दर्द रहने लगा। दवा से आराम मिलता, फिर दर्द लौट आता। बाद में मुँह और निगलने में भी दर्द होने लगा। गाँव के डॉक्टर ने दवा दी, लेकिन बीमारी बढ़ती गई।

आख़िरकार शहर के बड़े डॉक्टर को दिखाया गया। जाँच में मुँह का कैंसर निकला। घर में मातम छा गया। एक साल से ज़्यादा इलाज चला, लेकिन ज़हर बहुत फैल चुका था।

गुटखे ने मेंहदी की ज़िंदगी छीन ली।


 

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