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Showing posts from 2025

पत्ता : लघुकथा

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AI Image शमीमा हुसैन “लाइन के पार नहीं जाना? माई जो कहत उही करिये। सारा दिन गाछी में न घूमिये, बउआ।” साहबजान अपने बेटे मेंहदीजान को समझाकर सियालदह ट्रेन पकड़कर कलकत्ता चला गया। उस समय मेंहदी की उम्र सिर्फ सात साल थी। साहबजान ईद में घर आता था, साल में दो बार। पूरे साल कड़ी मेहनत करता और पैसा भेजता रहता। घर का खर्च ठीक से चल रहा था। मेंहदी बहुत प्यारा बच्चा था। माँ की हर बात मानता। माँ के साथ गाछी-गाछी घूमता, उसके कामों में मदद करता। दौड़-दौड़कर पत्ता चुनता, जल्दी-जल्दी बोरे में भरता और सिर पर उठाकर घर लाता। जब मेंहदी बारह साल का हुआ तो माँ को बहुत आराम हो गया। अब वह अकेले ही गाछी से पत्ता ले आता था। माँ कभी-कभी ही जाती थी। मेंहदी अब समझदार हो गया था। वह माँ से कहता, “अम्मा, तू पत्ता लाने मत जाओ, हम खुद चुन-बिछ लायेंगे।” माँ कहती, “हम भी थोड़ा-बहुत पत्ता लायेंगे, बरसात तक जलाने के लिए चाहिए।” लेकिन मेंहदी की ज़िद के आगे माँ ने पत्ता चुनना छोड़ दिया। अब घर में वही पत्ता जलता जो मेंहदी लाता। मेंहदी सब कुछ जल्दी सीख गया—साइकिल चलाना, सौदा लाना। होशियार बच्चा निकला। घर में उसकी वजह से रौनक थ...

पहला दिन : लघुकथा

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  AI Image शमीमा हुसैन  पति  है, उसका हक़ है कि वह मारे, गाली दे, लान-तान करे—सब सही है। यही कहती हैं “अम्माजी”। इस सोच से मर्दों का हौसला और बढ़ जाता है। पति है, वह बड़ा है, स्वामी है—सब बातें ठीक हैं। लेकिन वह करता क्या है? हर दिन अरीना को मारता है। पिछले महीने जून में भी मारा, मारकर बिज़नेस टूर पर चला गया। हर बार यही करता है। घर पर जब रहता है, तब अरीना का जीना हराम हो जाता है। अरीना कहती है, बताती है— “शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है जिस पर इस आदमी की मार न पड़ी हो, और मन का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है जो घायल न हुआ हो। बस अपने बच्चे के लिए सब सह रही हूँ।” “कितना सहन करोगी? छोड़ दो, अलग हो जाओ”—कुछ लोग ऐसा कहते हैं। पर कुछ लोग यह भी पूछते हैं—“क्यों मारता   है?” लोगों को सब पता होता है, लेकिन असल दर्द वही जानता है जिस पर मुसीबत आती है। जब पति जालिम होता है, तो मारने की कोई वजह नहीं होती। बस—अभी तक रेडी क्यों नहीं हुई, खाना अभी क्यों पका रही हो, इतनी रोटी क्यों बच गई, आज मैंने गोभी बोला था   तो भिंडी क्यों बनाई? यही सब वजहें होती हैं। एक दिन हद हो गई। वह म...

भूख : लघुकथा

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AI Image -शमीमा हुसैन  वह बहुत तेजी से चाकू चला रहा था। हठा-कट्ठा, छोटे कद का युवक था। रंग उसका गोरा था। उसके हाथ-पैर पर पड़ा खून साफ-साफ दिख रहा था, उसके गाल पर भी छींटे पड़े थे। इस खून के छींटों से उसे कोई तकलीफ़ नहीं थी। वह मुस्करा भी रहा था, हँस भी रहा था। हम जो दस-बारह लोग उसका मुँह ताक रहे थे, ऐसा लग रहा था कि उसे और भी मज़ा आ रहा है। मेरे आगे नाइटी में एक महिला खड़ी थी। बालों का जूड़ा रात वाला ही था, आधे बाल बिखरे हुए थे। हाथ नचाते हुए बोली, “ऐ रेहान, जल्दी कर, लाइन बढ़ती जा रही है।” “अब कितना जल्दी, मौसी?” मैं पीछे खड़ी थी, देखे जा रही थी कि इस पूरे आदमी का काम कितना हार्ड है। सुबह आठ बजे से ही मुर्गी ज़िबह करना, साफ करना, होटल के लिए काट-कूट करना, वजन करना और होटल में भेजना—सब शुरू हो जाता है। दस बजे ग्राहक आना शुरू हो जाते हैं। दस बजे से ग्राहकों को संभालना पड़ता है। पूरे दिन भर यही काम चलता रहता है। दोपहर दो बजे दो घंटे की छुट्टी होती है, फिर चार बजे से काम चालू हो जाता है। रात के बारह बज जाते हैं सफाई करते-करते। दिन भर हाथ में पानी लगा रहता है, दोनों पैरों में भी पानी ल...

पहचान : लघुकथा

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AI Image -शमीमा बानो मासूम बहुत सालों की कोशिश के बाद यूके जा सका था। उसने बहुत मेहनत से पढ़ाई की, डिग्रियाँ जमा कीं और साहपुर के कॉलेज में लेक्चरर लग गया। माँ-बाबा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। बेटा भी खुश था, लेकिन उसकी खुशी के भीतर एक कसक लगी हुई थी। उसका मन था कि यूके के किसी कॉलेज में लेक्चरर बन जाए। वह साहपुर के कॉलेज में प्रोफेसर हो गया था। दिन-रात कोशिश कर रहा था कि यूके के कॉलेज में चयन हो जाए। उसने पीएचडी की थी और अपने विषय पर उसकी गहरी पकड़ थी। फिजिक्स उसका फेवरेट सब्जेक्ट था और साहपुर कॉलेज में भी वह फिजिक्स का ही लेक्चरर था। आखिरकार मासूम की कोशिश सफल हो गई—यूके के एक कॉलेज में उसका चयन हो गया। अब सवाल था—जाने के लिए वीज़ा और पासपोर्ट का, और उसके लिए पैसे चाहिए थे। मासूम ने अब्बा से कहा, “अब्बा, मेरा सेलेक्शन हो गया है। पासपोर्ट बनवाने के लिए पैसे चाहिए।” अब्बा पहले से ही उसके जाने के खिलाफ थे। उनका मन था कि बेटा उनके पास रहे, शादी करे और यहीं सेटल हो जाए। उनका विचार था कि अपनी ही मिट्टी में रहना चाहिए। माँ को छोड़कर जाना वे गुनाह समझते थे। अब्बा ने साफ मना कर दिया। मासूम...

दुकान : लघुकथा

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  AI Image शमीमा हुसैन आज नईम का मन बिल्कुल अशांत था। पूरे दिन दुकान में बैठे-बैठे न जाने कितने ग्राहकों से उसकी नोकझोंक हो गई। एक ग्राहक को उसने सामान का दाम पाँच गुना बता दिया। पर ग्राहक चालाक था, उसे असली भाव पता था। उसने तमतमाते हुए कहा, “मैं दूसरे दुकान से पूछकर आया हूँ। पाँच सौ की चीज़ तेरह सौ में बता रहे हो, इतना गला क्यों काट रहे हो? मुनासिब दाम में बेचो, नहीं तो बड़ा पाप होगा।” यह सुनकर नईम का गुस्सा और भड़क उठा। वह बहस करने लगा, “अमीर लोग कितना बड़े-बड़े गुनाह करते घूमते हैं, पर किसी को उनका गुनाह नहीं दिखता! हम गरीब रोज़ी कमाएँ, तो वही पाप नज़र आता है!” ग्राहक ने बात बढ़ते देख झट से जान छुड़ा ली। “मेरे पास लड़ने का समय नहीं है,” कहकर वह जल्दी से निकल गया। और नईम का दिन इसी ऊहापोह में कटता रहा — हर आने-जाने वाले ग्राहक को उलझाने, भड़काने का मन होता रहा। गुस्सा इतना चढ़ा था कि आज ही आज मालिक के मुँह पर नौकरी छोड़कर निकल जाए। मगर पेट का सवाल था। काम छोड़ा तो कल से रोटी का इंतज़ाम कौन करेगा? नईम ने जैसे खून का घूँट पीकर खुद को रोक लिया। महीने के तीस दिनों में सिर्फ़ एक दिन छ...

माँ : लघुकथा

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AI Image शमीमा हुसैन घर में आज फिर कुछ भी राशन नहीं था। कल हमीदा की नानी ने थोड़ा-सा चावल दिया था, उसी का गोलथी बना कर बच्चों को खिलाया और खुद भी खा लिया। [गोलथी- चावल की पतला घोल ] भारी मुसीबत के बीच झाड़ू लगाते हुए उसके आँसू ज़मीन पर गिरते जा रहे थे। तभी उसकी सास जेतुन भीतर आई। वह बोली, “रूहान की माय, सुन! चावल ले, दाल ले, और ये दस रुपया भी रख ले। आलू भी मंगा ले। आज बच्चों को दाल-भात और आलू की भुजिया बनाकर खिला दे। आठ दिन से बेचारे सिर्फ घोलथी खा रहे हैं।” बहू की आवाज़ काँप रही थी, “अम्मा… तेल नहीं है।” जेतुन कुछ पल रुकी, फिर बोली, “अच्छा, समीना को भेज मेरे साथ। दुकान से उधारी में तेल खरीद लूंगी। ये लहसुन के खेत में कमैनी का काम कर के लाई गई मजूरी है — चल, दाल-चावल तो हो जाए।” वह समीना को लेकर दुकान चली गई। मेरी नज़रों में जेतुन एक आयरन लेडी है — जो बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी न टूटती है, न रोती है, बस हिम्मत से खड़ी रहती है। यह तीसरी बार है जब उसका बड़ा बेटा पागल हो गया है। जेतुन बनिहारी करके अपना और छोटे बेटे का पेट पालती है। बड़ा बेटा शादीशुदा है और अलग रहता है। पहले भी दो बार बेटा...

अब चाहे जो हो जाए : लघुकथा

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AI Image -शमीमा हुसैन शाम के चार बज रहे थे। आँगन में धूप की आख़िरी किरणें झुक रही थीं और लुना रसोई में पाँच किलो आटा गूँध रही थी। रोटी और चिकन का सालन बनाना था—सबके लिए, हर दिन की तरह। आटा गूँधते हुए अचानक उसे कल की बात याद आ गई। अम्मा जी ने ताना मारा था, “मैं तो कभी लेट नहीं हुई। इसे न जाने कैसे रोज़ लेट हो जाता है?” यह वाक्य चाकू की तरह उसके भीतर उतर गया था। नुकीला, ठंडा और चुभता हुआ। लुना की मुट्ठियाँ तन गईं। गुस्सा जैसे भीतर उबलता हुआ लावा हो—हर शब्द, हर ताना, हर दिन की मजबूरी उसे और तीखा कर देते थे। अपना- पराया का एहसास होता—वह गमला उठाकर ज़ोर से पटक देती है। धनिया, जीरा, काली मिर्च—जो चिकन के लिए उसने अभी-अभी निकाले थे—सब हवा में उड़ाकर ज़मीन पर बिखेर देती   बिखर जाते हैं। और वह चीखती है, “मैं अकेली ही क्यों सबका खाना पकाऊँ? सब लोग खाते हैं, तो सबको काम करना चाहिए! आरा मशीन की कमाई से सबका फ़ायदा है, लेकिन मेरा? शादी को दो साल हुए, और मेरी ज़िंदगी उन्होंने कोयले की भट्टी में झोंक दी है!” कल्पना में ही सही, वह लात-घूँसे से बाल्टियाँ और बर्तन उछाल देती है। पूरे घर में हंगाम...

जकीना की 'लाली' : लघुकथा

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AI Image शमीमा हुसैन जकीना! अरे जकीना, लाली को मार मत पिलाना। जकीना की अम्मा हाथ में खुरपी और बोरा लेकर दरवाज़े के बाहर निकलते हुए उसे समझा रही थी। माघ का महीना था। जकीना के पास चार बकरियाँ थीं—चितकबरी, लाली, पीली और एक और।  माघ का महीना गरीबों और बूढ़ों के लिए बहुत दुःख का महीना होता है, यह बात सब जानते हैं। पर लाली और फागी भैंस जैसी मवेशियों की तकलीफ़ की बात कोई नहीं करता। इसी बीच जकीना की बकरी “लाली” कई दिनों से बीमार थी। आज तो उसका मुँह भी सूजा हुआ था। लाली के दो छोटे बच्चे थे, दोनों अब भी दूध पीते थे। वे अभी बहुत छोटे थे। सारी बकरियों की देखभाल जकीना ही करती थी। जकीना के दो भाई थे, लेकिन वे कभी बकरी को हाथ तक नहीं लगाते थे। अब्बा कभी-कभार मदद कर देते थे। कहीं कटहल का पत्ता दिख गया, तो माँगकर ले आते थे। घर की बकरियों की पूरी जिम्मेदारी जकीना ही उठाती थी। हाड़ तोड़ ठंड में भी, कुहासा थोड़ा कम होते ही, शाल-स्वेटर पहने, वह बकरियों को नहर किनारे चराने ले जाती थी। जकीना अपनी बकरियों का बहुत ध्यान रखती थी। लेकिन माघ का महीना! बड़े-बड़े मवेशियों की हालत खराब हो जाती है। न जाने लाली को...

किराएदार : लघुकथा

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                                                                       AI Image शमीमा हुसैन एक शहरी अफसर का तबादला एक छोटे से कस्बे  में हो गया। साहब ने अपनी पावर का पूरा उपयोग किया ताकि तबादला रुक जाए, पर साहब की पावर विफल हो गई। तबादले के बाद साहब को घर खोजना था। कई मकानों को देखने के बाद साहब को एक मकान पसंद आया। मकान अच्छा था, बड़ा भी था। लेकिन मकान मालकिन के तेवर-गेवर कुछ अलग ही थे। वह भाड़ा ज्यादा बोल रही थी, और समय से पहले ही भाड़ा उसे चाहिए था। यह बात साहब को बहुत अखर रहा था। साहब ने सोच लिया कि इसे कोई बहाना देकर दूसरे मकान को खोज लूंगा। भाड़ा भी कम नहीं कर रही है। मकान के साथ में एक सटा हुआ बगीचा था। छोटा था, पर उसमें तरकारी, अमरूद, पपीता और एलोवेरा के पेड़ थे। साहब ने सवाल किया, "यह बगीचा किसका है?" मकान मालकिन ने कहा, "मेरा है। जिसको भाड़े पर मकान देती हूं, किरायेदार ही बगीचे की देखभाल करता है...

ओ बच्चे, तुम आत्महत्या नहीं करोगे : लघुकथा

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AI Image -नायला अदा सनी तेरह साल का दुबला-पतला, चुप-सा बच्चा था। स्कूल में उसकी उपस्थिति किसी साए की तरह थी—दिखाई तो देता था, पर महसूस कम होता था। वह ज़्यादातर समय अपनी सीट पर सिर झुकाए बैठा रहता, जैसे दुनिया उससे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रही हो और वह उसके पीछे कहीं धूल में छूट गया हो। टीचर मिस्टर गुप्ता उसे रोज़ किसी न किसी बात पर डांट देते—कभी होमवर्क अधूरा, कभी क्लासवर्क कम, कभी बस इसलिए कि वह “ध्यान नहीं देता।” सनी सच में ध्यान नहीं दे पाता था। बोर्ड पर लिखी लाइनें उसके लिए धुंधली नहीं थीं, मगर समझ के पार थीं। उसका दिमाग मानो कुछ और ही सोचता रहता—क्या, उसे खुद भी ठीक से नहीं पता था। क्लासमेट्स भी उसे ज़्यादा घुलने नहीं देते। “बोलता नहीं”, “अजीब है”, “हमेशा खोया रहता है”—ऐसे लेबल उसकी पीठ पर चिपक गए थे। धीरे-धीरे वह खुद भी मानने लगा था कि शायद उसके अंदर सच में कुछ गड़बड़ है। एक दिन, जब मिस्टर गुप्ता ने पूरी क्लास के सामने उसे ज़ोर से डांटा—“ये लड़का कुछ नहीं कर पाएगा”—तो अंदर कुछ टूट-सा गया। सनी ने पहली बार सोचा कि शायद… शायद वह सच में कुछ नहीं कर पाएगा। उस दिन स्कूल से घर लौटते वक्त उ...

संदेह के साये : लघु कथा

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AI Image -नायला अदा अर्मान 25 साल का एक साधारण-सा युवक था। एक छोटे से शहर में पला-बढ़ा, वहीँ की एक कंपनी में नौकरी करता था। उसकी ज़िंदगी में सब कुछ सामान्य ही था, बस एक बात उसे ख़ास बनाती थी—उसका प्यार। सलमा, जिसे देखकर उसके दिल में पहली बार धड़कनें तेज़ हुई थीं। सलमा उसके ही मोहल्ले में रहती थी और दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। समय के साथ दोस्ती का यह रिश्ता प्यार में बदल गया। अर्मान शर्मीला स्वभाव का था, पर सलमा से बात करते समय उसकी झिझक कहीं खो जाती। सलमा भी उसे पसंद करती थी, पर समाज और घर के दबाव को देखते हुए वह अपने भावों को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाती थी। दोनों का रिश्ता अनकहा होते हुए भी गहरा था। एक दिन की बात है। अर्मान ऑफिस से लौट रहा था। रास्ते में उसने सलमा को किसी युवक के साथ देखा। वह युवक लंबा-सा, साफ-सुथरे कपड़ों में, हँसते हुए उससे बातें कर रहा था। सलमा भी मुस्कुरा रही थी। अर्मान उनकी नज़दीकियाँ देखकर ठिठक गया। वह दूर से ही चुपचाप उन्हें देखता रहा। उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठ पड़ा— "ये कौन है? सलमा ने कभी इसके बारे में क्यों नहीं बताया?" उस रात अर्मा...

लघुकथा: मौन

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  AI Image -नायला अदा मुंबई की एक व्यस्त सड़क के किनारे, फुटपाथ पर एक फटे कंबल के सहारे दिन गुज़ारने वाला एक बूढ़ा भिखारी पड़ा रहता था। सुबह होते ही वह उठकर आस-पास की दुकानों के सामने फैल जाता—कबीर चायवाला, सेठी जनरल स्टोर्स, फिर दवा की दुकान... सब उसकी दिनचर्या के गवाह थे। कोई उसे सिक्का देता, कोई नज़रें फेर लेता, तो कोई तिरस्कार भरी बात कहकर भगा देता। मगर वह सब सह लेता—क्योंकि उसके पास खोने को अब कुछ बचा ही कहाँ था। फुटपाथ उसका घर था, आसमान उसकी छत। दोपहर तक वह फुटपाथ पर लौट आता और चाय की ठंडी प्याली को दोनों हथेलियों में दबाए देर तक बैठा रहता। उसकी आँखों में अक्सर एक दूर का शून्य तैरता—जैसे कुछ खोज रहा हो, जो बहुत पीछे छूट गया हो। उस दिन भी ऐसा ही था। दुकानें खुल चुकी थीं, सड़क पर गाड़ियों की तेज़ रफ्तार आ-जा रही थी। वह वहीं बैठा था कि एक चमचमाती कार ठीक सामने आकर रेड सिग्नल पर रुकी। कार में बैठा युवक फोन पर कुछ बात कर रहा था—चेहरे की बनावट, आँखों की आकृति, आँखों के नीचे का हल्का तिल… बूढ़ा सिहर उठा। यह उसका बेटा था—वही बेटा जिसने कभी उसका हाथ थामकर सायकल सीखी थी, वही जिसने पहली...

धुआं : लघुकथा

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AI Image शमीमा हुसैन वह एक बहुत खूबसूरत लड़की थी। उसकी अम्मा के पास बहुत ज़मीन थी, बाप सरकारी टीचर था। पर अम्मा को दस कट्ठा ज़मीन से संतोष नहीं था। वह सालों-साल पैसे बचाकर ज़मीन खरीदती रही। चार साल में दो कट्ठा ज़मीन तो ज़रूर खरीद लेती थी। पूरा ध्यान इस बात पर रहता था कि कैसे और ज़मीन खरीदी जाए और पैसे कैसे बचाए जाएं। इसी बचत में ही उसने दो बेटियों की शादी भी कर दी। अब तीसरी और सबसे छोटी बेटी मुनव्वर की शादी की बात चल रही थी। दो-तीन लड़कों से रिश्ता आया। एक लड़का बैंक में काम करता था, मगर उसके माँ-बाप को मोटा दहेज चाहिए था। बात वहीं खत्म हो गई। दूसरा लड़का जिला प्रखंड कार्यालय में काम करता था, लेकिन उसकी भी दहेज की माँग थी। ऐसा नहीं कि अम्मा के पास पैसे नहीं थे— खेत के लिए पैसा बचाकर रखा था। खेत बेटा के लिए खरीदना ज़रूरी था, लेकिन बेटी की शादी बिना दहेज हो जाए, यही चाह थी। उधर रिश्तेदारी में एक फूफी के बेटे की पहली शादी एक साल में ही टूट गई थी— उसकी बीवी भाग गई थी। अब वह दूसरी बार शादी के लिए लड़की ढूँढ रहा था। एक दिन अम्मा खेत के लिए बीज खरीदने मेला गई। वहीं उसे दूर की वही फूफी मिली। ...

चाय का कप : लघुकथा

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AI Image -नायला अदा रेहाना की उम्र तो बस पंद्रह बरस थी, पर उसकी आंखों में वक़्त की धूल जमी थी। बचपन उसे छूकर भी नहीं गया था। सुबह की पहली अज़ान के साथ वह उठती, गली-गली के घरों में काम करती — बर्तन, झाड़ू, पोंछा और कभी-कभी चूल्हे की तपिश भी झेलती। उस रोज़ अमजद साहब के घर उसने जल्दी-जल्दी काम निपटाया। उन्हें चाय बनाकर कमरे में ले जा ही रही थी कि हाथ काँप गया। कप ज़मीन पर गिरा — और जैसे ही गिरा, सन्नाटा टूट गया। "अरे हरामखोरी की हद है! तमीज़ नहीं है चाय देने की?" अमजद की आवाज़ में जहर था। रेहाना ने सिर झुका लिया, "गलती हो गई, साहब..." लेकिन माफी मांगने से पहले ही एक झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। अमजद की बीवी ने थप्पड़ों से अपना गुस्सा उतारा, और फिर दोनों ने उसे पीट-पीटकर जैसे अपनी हैसियत जताई। रेहाना के फटे दुपट्टे और सूजे गालों के बीच, उसकी चुप आंखें कुछ बोल गईं — दर्द की जुबान दुनिया को अक्सर देर से समझ आती है। मगर मोहल्ले की औरतों ने देखा, सुना... बात एक समाजसेवी तक पहुँची। केस दर्ज हुआ। और एक दिन वही अमजद अदालत की चौखट पर खड़ा था — शर्मिंदा, लेकिन देर स...

खाड़ी का आईना : लघुकथा

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AI Image -शमीमा हुसैन  पानी साफ था। इतना साफ कि अपना चेहरा थोड़ा झुकाकर आईने की तरह देखा जा सकता था। मैं पानी देखकर हैरान हो गई—एक तरफ इतना प्रदूषण और दूसरी तरफ इतनी सफाई! एक लंबी खाड़ी के सामने मैं खड़ी थी। पानी चांदी की तरह चमक रहा था। हम थोड़ी दूरी पर थे, जहां कबूतरों की बारात लगी हुई थी। किसी ने राजमा और गेहूं बिखेर दिया था। कबूतर बड़े ही प्यार से गेहूं खा रहे थे। कबूतरों के झुंड से थोड़ी दूर एक सफेद चिड़ियों का झुंड था। सारी चिड़ियाँ चांदी के वर्क जैसी लग रही थीं। हवा तेज नहीं थी, लेकिन खाड़ी की थोड़ी-सी हवा भी बहुत ज़्यादा लग रही थी। मेरे बाल खुले हुए थे। हवा मेरे बालों से खेलने लगी। बाल मेरे चेहरे और आंखों में उड़ने लगे। मैं उस पल के जादू में खो गई। ऐसे ही नज़ारे दूर तक फैले थे। मैं चलती गई। चलते-चलते प्यास लग गई। कई लोग पानी बेच रहे थे। एक महिला भी पानी बेच रही थी। पानी, कबूतर, हवा के साथ-साथ मैं और भी बहुत कुछ देख रही थी। वह पानी वाली बड़े ही मीठे स्वर में गा रही थी — "ठंडा-ठंडा बिसलेरी पियो..." वह मेरे पास दो-तीन बार होकर गई। मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई — "आंटी! प...

कहानी : नदी के किनारे

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AI ART कहानी : नायला अदा फरहत लंबे बालों वाली लड़की थी। वह चलती तो लोग उसके लंबे लहराते बालों की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे। वह थी तो बहुत सीधी-सादी, लेकिन पढ़ने में तेज़ तर्रार। उसका गाँव अल्ताफपुर हरियाली और परंपराओं के लिए जाना जाता था। वहीं से लगे हुए एक दूसरे गाँव नूरपुर में रहता था एहसान खान। वह लंबा और गोरा युवक था। वह जब मोटरसाइकिल पर कॉलेज जाता तो लड़कियों की नज़रें उसी पर टिकी रहतीं। फरहत और एहसान की पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई थी, जब दोनों एक ही किताब के लिए हाथ बढ़ा बैठे थे – “अकबर और बीरबल की कहानियाँ।” दोनों झिझकते हुए मुस्कराए और किताब  साथ-साथ पढ़ने लगे। धीरे-धीरे मुलाकातें चाय की दुकानों, लाइब्रेरी के कोनों और कॉलेज के बागों में बदलने लगीं। एहसान की बातें मीठी थीं, और फरहत की आँखों में सपनों का समुंदर। बारिशों के दिन थे। पेड़ों के नीचे दोनों छाते की छांव में भीगते हुए भी बातों में खोए रहते। एहसान ने एक दिन फरहत का हाथ थामकर कहा, "तू जो कहेगी, वही करूंगा ज़िंदगी में। मैं सिर्फ़ तेरा हूँ।" फरहत की आँखें भीग गईं। शायद बारिश से, शायद एहसान के वादो...

कहानी : रील के बाद

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कहानी : नायला अदा AI art उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में, एक पुराना सा, खपरैल वाली छत का मकान था—न सफेद, न काला, बस वक्त की गर्द से रंगहीन। इसी घर में रहती थी नज्मा, एक पचपन की उम्र पार कर चुकी विधवा, जिसने जीवन की सारी चुनौतियों को अपने हाथ की सुई और धागे से सीकर झेला था। पति की मौत के बाद वह टूटी नहीं, बल्कि और मजबूत हो गई। अकेली औरत, दो बेटियों की मां—कोई सहारा नहीं, बस उम्मीद और हुनर। नज्मा का पूरा दिन सिलाई मशीन के आगे गुजरता था। वो सुबह की नमाज़ के बाद अपनी मशीन पर बैठती और देर रात तक लोगों के कपड़े सिलती रहती। कभी सलवार-कुर्ते, तो कभी स्कूल यूनिफॉर्म। उसी से दो वक्त की रोटी और बेटियों की फीस निकलती थी। बड़ी बेटी रौनक बारहवीं में थी। सुंदर, आत्मविश्वासी और नयी दुनिया से बेहद आकर्षित। उसे मोबाइल पर रील बनाना पसंद था। वो अपनी सहेलियों के साथ स्कूल की यूनिफॉर्म में गाने पर लिप्सिंक करती, कभी डांस, कभी एक्टिंग। घर में वह मोबाइल स्टैंड पर मोबाइल रखती और रूमाल को घूंघट की तरह ओढ़कर डायलॉग बोलती—“मुझे हीरोइन बनना है अम्मी।” नज्मा पहले तो हँस देती, मगर धीरे-धीरे डरने लगी। दुनिया देख...

गुलज़ार हुसैन के तीन कविता-पोस्टर

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  हिन्दवी ने बनाया है यह पोस्टर। हौसला वेबसाइट का बनाया पोस्टर। गुलजार हुसैन के काव्य संग्रह से एक कविता का अंश। झपसी ब्लॉग पर गुलज़ार हुसैन की कविताओं के तीन पोस्टर

सुनो लड़कियों : गुलज़ार हुसैन की एक कविता

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Artist : Gulzar Hussain सुनो, भ्रूण हत्या के आतंक का शिकार होने से बची लड़कियों सुनो कि यह समय निश्चिंत होकर बैठने का नहीं है यह समय बेहद सतर्क रहने का है क्योंकि गिद्ध अब भी मंडरा रहे हैं ये वही गिद्ध हैं जो तुम्हारे जिस्म को तुम्हारी मां के गर्भ में ही नोचना चाहते थे और अब ये तुम्हारे बचपन की अल्हड़ता पर नजरें गड़ाए हैं सुनो, युवा होती लड़कियों गिद्ध कहीं दूर नहीं गया है वह घर के बाहर भी हो सकता है और घर के अंदर भी तुम्हें डरा सकता है वह कार के अंदर से तुम्हें घूर सकता है और सडक किनारे से फब्तियां कस सकता है सुनो लड़कियों वह गिद्ध तुम्हें शादी से पहले एक दोस्त के रूप में मिल सकता है और प्रेमी के रूप में भी तुम्हें चोट पहुंचा सकता है वही गिद्ध तुम्हें शादी के बाद पति के रूप में मिल सकता है और दहेज के लिए तुम्हें जलाने की साजिश भी रच सकता है इसलिए, सुनो लड़कियों ऐसे गिद्ध पुरुषों को धक्के देकर आगे बढ़ जाओ -गुलज़ार हुसैन

रेगिस्तान में संकटों के बीच फंसे थे गुर्जिएफ

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AI Image गोबी रेगिस्तान पार करते समय किया रेतीली आंधियों का सामना जंगली ऊंट के काटने से हुई साथी की मौत टारेंट्युला के डंक के बाद काटा अपने साथी के पैर का मांस बतख के शिकार के चक्कर में दोस्त ने दागी पैर पर गोली पिता ने सांप के साथ खेलने को किया मजबूर -गुलजार हुसैन   प्रसिद्ध लेखक-विचारक जी. आई. गुर्जिएफ (George Ivanovich Gurdjieff) ने विलक्षण मनुष्यों के संग बिताए बेहद रोचक पलों, रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक अनुभवों से अपनी जिंदगी संवारी थी। अपनी चर्चित पुस्तक मिटिंग्‍स विद रिमार्केबल मेन (Meetings with Remarkable Men) में उन्होंने एक से बढ़कर एक रोमांचक पलों को याद किया है। खौफनाक गोबी रेगिस्तान में जाना किसी भी मनुष्य के लिए आसान नहीं था, तब 1898 में गुर्जिएफ अपने ग्रुप के साथ वहां पहुंचे। इस बेहद खतरनाक और मुसीबतों से भरी यात्रा ने उनके जीवन को झकझोर कर रख दिया था। इनका ग्रुप ताशकंद से होते हुए शरक्शां नदी के किनारे से आगे बढ़ा था। गुर्जिएफ ने दिक्कतों का सामना करते हुए बहुत सारे दुर्गम पहाड़ी दर्रों को पार किया, तब जाकर वे गोबी रेगिस्तान के पास एक गांव में पहुंचे। गांव में उन्ह...

बाबासाहेब आंबेडकर की बताई राहों पर

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मुंबई में बाबासाहेब के विचार वाले पोस्टर।  File photo/ Gulzar Hussain गुलज़ार हुसैन बाबासाहेब की जयंती पर विशेष मैं जब मुंबई आया था, तो उस समय हर कदम पर एक नया संघर्ष मेरे सामने आ जाता था। आज भी संघर्ष ही अपना साथी है, लेकिन मुंबई में रहते हुए कठिन पलों के बीच आत्मसम्मान के साथ जीने की राह मुझे बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों ने दिखाई। मुंबई में पैदल चलते समय यह सोचकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा होता रहा कि यही वह धरती है, जहां बाबासाहेब ने संघर्ष करते हुए मानवता का संदेश दिया।  मुंबई बाबासाहेब की कर्मभूमि रही और यहां मैंने भी पसीना बहाया है। यहां रहते हुए लिखता रहा ...चलता रहा ...जीता रहा। उनकी किताबें मुझमें उत्साह भरती रहीं ...कहती रहीं- कोई इंसान जाति-धर्म के आधार पर न किसी से रत्ती भर छोटा है न बड़ा। मैं उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर हर साल दादर के चैत्यभूमि जाता रहा हूं। वहां शिवाजी पार्क में लगने वाले पुस्तक मेले की बात ही कुछ और होती है। कई आंबेडकरवादी दोस्तो से मिलना तो होता ही है, साथ ही कई लेखकों और एक्टिविस्टों को सुनने को भी मिलता है। नई किताबें भी खरीदने का यह बेहतरीन मौका...

घास : लघुकथा

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AI IMAGE शमीमा हुसैन बारिश खूब तेज है। मई का आखरी दिन है। आम, लीची पककर बाजार में आ गए हैं।   फरमान साहब की दो गाये हैं। दोनों बच्चावाली हैं। बेचारा बूढ़ा फरमान आसमान की तरफ देख रहा है कि कब बारिश रुके। वह बार-बार सर को खुजा रहा है। गाय के नाद में देखता और फिर कुट्टी को देखता है। उसकी  बेचैनी खटिया पर बैठी बुढ़िया देख रही थी। उसे रहा नहीं गया। गुस्से से भरकर बोली, ''आराम से बैठ ...बारिश है तूफानी ...जो घास-भूसा है उहे रहने दे।'' बूढ़ा तुनककर बोला, ''हफीज के माई, तुमको कुछ दिखाई नहीं देता है। दोनों अल्माती गाय है। इसे घास मिलना जरूरी है। बहू भी गुस्सा जतई, हम ई बारिश में ही घास काटे चल जबई।'' दो गाये हैं। दूध बेच कर जो भी पैसा होता है उसकी बहू के हाथ में जाता है।  मेरी शादी के पांच साल हो गए। आज तक चाची को कुछ खरीदते हुए नहीं देखा? जबकि मुहल्ले में रोज बेचने वाला आता है। लाई, मिठाई वाला, आम, अंगूर, केला, सभी फल वाला आता है। पर उनके मुंह पर एक पीड़ा दिखती है। पर मैं क्या करूं पड़ोस की बहू हूं। फरमान साहब जूट मील में नौकरी करते थे। अब रिटायर हैं। पेंशन भी बे...