कोरोना की दूसरी लहर मुंबई (Mumbai) को फिर से तंग कर रही है। नाइट कर्फ्यू है, लेकिन मुंबई की रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही है। मेहनतकश लोग रोजी रोटी के लिए खूब पसीना बहा रहे हैं।
बेहद ही संवेदनशील मुद्दा है जीवन जीना आसान नहीं है रोजी-रोटी कमाने के लिए गांव से शहरों में और शहरों से महानगरों में अपनी पहचान बनाने, रोजगार और जीवन सत्र को सुधारने के लिए आते हैं लेकिन अब कहां जाएं चांद पर???
AI IMAGE -शमीमा हुसैन आज जुमा का दिन था, लेकिन सुल्ताना का मन सुबह से ही भारी था। वह धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाली स्त्री थी। फज्र की नमाज़ से लेकर रात ईशा तक उसका दिन मशीन की तरह चलता। ईशा की नमाज़ अदा करने के बाद वह इतनी थक जाती कि कई बार पानी पीने का भी होश नहीं रहता। सुल्ताना की तीन बहुएँ थीं। स्वभाव तीनों के अलग थे, पर आँगन एक ही था। घर भी एक ही आँगन में बने थे। सुल्ताना की दिली ख्वाहिश थी कि तीनों बहुएँ मिल-जुलकर रहें, एक साथ परिवार बनाकर। लेकिन बहुओं ने साफ़ कह दिया—वे इकट्ठा नहीं रह सकतीं। सुल्ताना ने ज़्यादा विरोध नहीं किया। उम्र के साथ वह यह समझ चुकी थी कि रिश्तों को ज़ोर से नहीं बाँधा जा सकता। तीनों अलग हो गईं। अब सवाल खड़ा हुआ—सुल्ताना कहाँ रहेगी? छोटे बेटे ने कहा, “अम्मी, आप मेरे साथ रहिए।” पर सुल्ताना ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। तीन दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया। मन ही मन वह टूटती रही। तीन दिन बाद उसने तीनों बेटों और बहुओं को बुलाया और एक बार फिर साथ रहने की बात समझाई, मगर कोई तैयार नहीं हुआ। आख़िरकार सुल्ताना ने फ़ैसला सुनाया— “म...
AI Image -शमीमा हुसैन जब मैं कम्पनी गई तो मुझे अजीब लगा। गेट पर दरवाज़ा छोड़कर, दरवाज़े के दोनों साइड बड़े-बड़े बोरे भरकर रखे हुए थे। पाँच-सात चालियों के बाद कम्पनी थी। आसपास कोई भी दुकान नहीं थी। कम्पनी की दीवार ऊँची और लम्बी थी, जिससे चोरी की संभावना कम लगती थी। गेट के अंदर जाते ही एक तरफ बहुत-सी कपड़ों की बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखी हुई थीं। दूसरी तरफ दीवार से सटा हुआ एक बड़ा टेबल था। उस टेबल के पास एक महिला और एक लड़की खड़े होकर शर्ट की मार्किंग कर रही थीं। दूसरी साइड में दस-बारह सिलाई मशीनें लगी थीं, जिन पर सिलाई मास्टर बैठकर काम कर रहे थे। उसी लाइन में बटन लगाने की मशीन थी, जिस पर माजिद बैठकर बटन लगा रहा था। मैं माजिद के पास जाकर बोली, “माजिद, कैसी उजाड़ कम्पनी है, कैसे मन लगता है यहाँ?” माजिद हँसने लगा और बोला, “भाभी, चाय मंगाता हूँ।” मैं भी ज़ोर से हँस पड़ी और बोली, “कभी बाद में चाय पिऊँगी, आज नहीं। आज तो कम्पनी देखने आई हूँ—माजिद कैसे काम करता है।” मैं कम्पनी देखने में व्यस्त हो गई। मशीनों की खटर-पटर की आवाज़ मिलकर एक शोर में बदल गई थी, क्योंकि एक साथ दस-बारह मशीनें चल ...
AI IMAGE शमीमा हुसैन बारिश खूब तेज है। मई का आखरी दिन है। आम, लीची पककर बाजार में आ गए हैं। फरमान साहब की दो गाये हैं। दोनों बच्चावाली हैं। बेचारा बूढ़ा फरमान आसमान की तरफ देख रहा है कि कब बारिश रुके। वह बार-बार सर को खुजा रहा है। गाय के नाद में देखता और फिर कुट्टी को देखता है। उसकी बेचैनी खटिया पर बैठी बुढ़िया देख रही थी। उसे रहा नहीं गया। गुस्से से भरकर बोली, ''आराम से बैठ ...बारिश है तूफानी ...जो घास-भूसा है उहे रहने दे।'' बूढ़ा तुनककर बोला, ''हफीज के माई, तुमको कुछ दिखाई नहीं देता है। दोनों अल्माती गाय है। इसे घास मिलना जरूरी है। बहू भी गुस्सा जतई, हम ई बारिश में ही घास काटे चल जबई।'' दो गाये हैं। दूध बेच कर जो भी पैसा होता है उसकी बहू के हाथ में जाता है। मेरी शादी के पांच साल हो गए। आज तक चाची को कुछ खरीदते हुए नहीं देखा? जबकि मुहल्ले में रोज बेचने वाला आता है। लाई, मिठाई वाला, आम, अंगूर, केला, सभी फल वाला आता है। पर उनके मुंह पर एक पीड़ा दिखती है। पर मैं क्या करूं पड़ोस की बहू हूं। फरमान साहब जूट मील में नौकरी करते थे। अब रिटायर हैं। पेंशन भी बे...
बेहद ही संवेदनशील मुद्दा है जीवन जीना आसान नहीं है रोजी-रोटी कमाने के लिए गांव से शहरों में और शहरों से महानगरों में अपनी पहचान बनाने, रोजगार और जीवन सत्र को सुधारने के लिए आते हैं लेकिन अब कहां जाएं चांद पर???
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